भारत में अगर किसी सरकारी संस्था पर सबसे गहरा भरोसा कायम है, तो वह है डाकघर। देशभर में करीब 38 करोड़ लोगों ने अपनी बचत post office में 38 करोड़ लोगों ने जमा किया पैसा, फिर भी घाटे में क्यों है डाक विभाग? में जमा कर रखी है और कुल जमा राशि लगभग 22 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। ग्रामीण से लेकर शहरी भारत तक, करोड़ों परिवार अपनी मेहनत की कमाई को सुरक्षित रखने के लिए डाकघर को ही प्राथमिकता देते हैं। सरकारी गारंटी और दशकों से बनी विश्वसनीयता ने पोस्ट ऑफिस को आम जनता की नजर में सबसे सुरक्षित निवेश विकल्प बना दिया है।
हालांकि, इस भरोसे और विशाल जमा आधार के बावजूद एक बड़ा विरोधाभास सामने आता है—इतना बड़ा नेटवर्क होने के बाद भी डाक विभाग वित्तीय घाटे में चल रहा है। यही सवाल आज नीति-निर्माताओं और आर्थिक विशेषज्ञों के सामने चुनौती बनकर खड़ा है कि आखिर इतने बड़े ग्राहक आधार और जमा राशि के बावजूद विभाग की आय कम क्यों है।
सुकन्या योजना की सफलता
डाकघर सिर्फ बचत खातों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई सरकारी योजनाओं के जरिए सामाजिक सुरक्षा का मजबूत माध्यम भी बना हुआ है। इनमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय योजना सुकन्या समृद्धि योजना है, जिसे बेटियों की शिक्षा और विवाह के लिए शुरू किया गया था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस योजना के तहत अब तक करीब 3.8 करोड़ खाते खोले जा चुके हैं और इनमें कुल जमा राशि लगभग 2.27 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। यह दर्शाता है कि भारतीय परिवार अपनी बेटियों के आर्थिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए पोस्ट ऑफिस योजनाओं पर व्यापक भरोसा कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से इस योजना की स्वीकार्यता अधिक है, जहां बैंकिंग पहुंच सीमित होने के कारण डाकघर ही प्रमुख वित्तीय संस्था के रूप में काम करता है।
ग्रामीण भारत की आर्थिक रीढ़: विशाल नेटवर्क और पहुंच
डाकघर का सबसे बड़ा आधार इसकी पहुंच है। देश में लगभग 1.65 लाख डाकघर और करीब 4.5 लाख कर्मचारी इस नेटवर्क को संचालित करते हैं। यह दुनिया के सबसे बड़े पोस्टल नेटवर्क में से एक है। दूरदराज गांवों, पहाड़ी क्षेत्रों और सीमावर्ती इलाकों तक जहां बैंक शाखाएं कम हैं, वहां डाकघर ही वित्तीय सेवाओं और सरकारी योजनाओं का मुख्य केंद्र है। इसी वजह से ग्रामीण भारत की आर्थिक गतिविधियों में डाकघर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। बचत खाते, मनी ट्रांसफर, बीमा, पेंशन और सरकारी योजनाओं के वितरण जैसे कई काम इसी नेटवर्क के जरिए होते हैं।
तकनीक से बदलती सूरत: ड्रोन से डिलीवरी तक
समय के साथ डाक विभाग भी आधुनिक तकनीक को तेजी से अपना रहा है। पार्सल और लॉजिस्टिक्स सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए कन्वेयर सिस्टम, RFID, बारकोड और QR कोड जैसी तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाया गया है। इससे ट्रैकिंग और डिलीवरी की सटीकता में सुधार हुआ है। इसके अलावा, दुर्गम और पहाड़ी इलाकों में डिलीवरी तेज करने के लिए ड्रोन तकनीक को अपनाने की तैयारी की जा रही है। जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में ड्रोन के जरिए डाक वितरण शुरू करने की योजना है। इस पहल से उन क्षेत्रों में सेवाएं बेहतर होंगी जहां पारंपरिक परिवहन साधन सीमित हैं। लगातार सुधार और निगरानी के कारण अब निष्क्रिय डाकघरों की संख्या भी घटकर लगभग 1,500 रह गई है, जो पहले की तुलना में काफी कम है।
भरोसा बड़ा, कमाई कम: घाटे की असली वजह
इतनी बड़ी जमा राशि और ग्राहक आधार के बावजूद डाक विभाग की आय अपेक्षाकृत बहुत कम है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, विभाग का सालाना खर्च लगभग 35,000 करोड़ रुपये है, जबकि कुल वार्षिक आय करीब 13,000 करोड़ रुपये ही है। यानी हर साल भारी वित्तीय अंतर बना रहता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि डाकघर का मुख्य फोकस सामाजिक सेवा और वित्तीय समावेशन पर रहा है, न कि व्यावसायिक लाभ पर। ग्रामीण क्षेत्रों में शाखाएं चलाने, कर्मचारियों का खर्च, लॉजिस्टिक्स और सार्वभौमिक सेवा दायित्व जैसी जिम्मेदारियों के कारण लागत अधिक रहती है, जबकि सेवाओं से होने वाली कमाई सीमित है।
कुछ राज्यों में स्थिति और चुनौतीपूर्ण है, जहां खर्च आय से कई गुना अधिक है। एक उदाहरण में विभाग ने एक वर्ष में लगभग 1,800 करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि आय केवल 600 करोड़ रुपये रही। हालांकि बाद में आय बढ़कर 850 करोड़ रुपये तक पहुंची, फिर भी घाटा बना रहा।
भरोसे को आय में बदलने की चुनौती
डाक विभाग के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जनता के इस विशाल भरोसे को आर्थिक रूप से टिकाऊ मॉडल में कैसे बदला जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि लॉजिस्टिक्स, ई-कॉमर्स डिलीवरी, डिजिटल बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं के विस्तार से आय बढ़ाई जा सकती है। स्पष्ट है कि पोस्ट ऑफिस केवल एक डाक सेवा नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक-आर्थिक संरचना का महत्वपूर्ण स्तंभ है। 38 करोड़ खातों और 22 लाख करोड़ रुपये की जमा राशि इस भरोसे की गहराई को दिखाती है। अब जरूरत इस बात की है कि इस भरोसे को मजबूत रखते हुए डाक विभाग को वित्तीय रूप से भी आत्मनिर्भर बनाया जाए।