Hormuz crisis: वेस्ट एशिया में जारी युद्ध अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई और अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है। लगातार हो रहे हमलों के कारण तेल और गैस से जुड़े अहम ठिकाने बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर संकट गहराता जा रहा है।
40 से ज्यादा ऊर्जा ठिकाने क्षतिग्रस्त
International Energy Agency (IEA) के प्रमुख Fatih Birol के अनुसार, इस युद्ध में नौ देशों के 40 से अधिक ऊर्जा ठिकाने गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। इनमें तेल के कुएं, रिफाइनरी और पाइपलाइन शामिल हैं। इन ठिकानों को हुए नुकसान का असर तुरंत खत्म होने वाला नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन्हें दोबारा चालू करने में लंबा समय लग सकता है, जिससे सप्लाई चेन पर लगातार दबाव बना रहेगा।
तेल-गैस सप्लाई पर बड़ा खतरा
तीन हफ्तों से ज्यादा समय से जारी इस संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है। खासतौर पर Strait of Hormuz, जो दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है, लगभग बंद होने की स्थिति में पहुंच गया है। इस रास्ते से दुनिया का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल और गैस गुजरता है। इसके प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेजी आई है, जिसका असर आम लोगों तक पहुंच रहा है।
1970 के तेल संकट जैसा खतरा
Fatih Birol ने मौजूदा हालात की तुलना 1970 के दशक के तेल संकट और 2022 के गैस संकट से की है। यह संकेत देता है कि स्थिति कितनी गंभीर हो सकती है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ ऊर्जा तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े कई उद्योग भी प्रभावित हो रहे हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
पेट्रोकेमिकल से लेकर फर्टिलाइजर तक असर
ऊर्जा संकट का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है। पेट्रोकेमिकल, फर्टिलाइजर, सल्फर और हीलियम जैसे जरूरी उत्पादों का उत्पादन और सप्लाई भी प्रभावित हो रही है। इन उत्पादों का इस्तेमाल खेती, उद्योग और टेक्नोलॉजी सेक्टर में बड़े पैमाने पर होता है। ऐसे में इनकी कमी से उत्पादन लागत बढ़ सकती है और महंगाई में और इजाफा हो सकता है।
एशियाई देशों पर ज्यादा असर
इस संकट का सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों पर पड़ रहा है, क्योंकि ये देश वेस्ट एशिया से आने वाले कच्चे तेल पर काफी हद तक निर्भर हैं। भारत, चीन और जापान जैसे बड़े अर्थतंत्र सीधे तौर पर इस संकट की चपेट में हैं। चीन द्वारा ईंधन निर्यात सीमित करने के फैसले ने भी चिंता बढ़ा दी है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसे समय में देशों को सहयोग की जरूरत है, न कि प्रतिबंधों की।
IEA का बड़ा कदम: भंडार से तेल जारी
संकट को कम करने के लिए International Energy Agency ने अपने आपात भंडार से 400 मिलियन बैरल तेल जारी करने का फैसला किया है। इसका उद्देश्य सप्लाई की कमी को पूरा करना और कीमतों को नियंत्रण में रखना है। इसके अलावा, एजेंसी ने तेल आयात करने वाले देशों को खपत कम करने और वैकल्पिक उपाय अपनाने की भी सलाह दी है।
आगे क्या? संकट और गहरा सकता है
Fatih Birol ने चेतावनी दी है कि अगर हालात और बिगड़ते हैं, तो अतिरिक्त तेल भंडार भी जारी करना पड़ सकता है। लेकिन यह केवल अस्थायी समाधान होगा। स्थायी समाधान तभी संभव है, जब Strait of Hormuz जैसे अहम समुद्री मार्ग को पूरी तरह सुरक्षित और चालू किया जाए।
वैश्विक सहयोग ही एकमात्र रास्ता
वेस्ट एशिया का यह युद्ध अब वैश्विक संकट का रूप ले चुका है। ऊर्जा सप्लाई में बाधा, बढ़ती कीमतें और प्रभावित उद्योग—ये सभी संकेत दे रहे हैं कि आने वाले समय में चुनौतियां और बढ़ सकती हैं। ऐसे में दुनिया के देशों को मिलकर काम करने की जरूरत है, ताकि इस संकट को समय रहते नियंत्रित किया जा सके और वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़े नुकसान से बचाया जा सके।