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The Industrial Empire - उद्योग, व्यापार और नवाचार की दुनिया | The World of Industry, Business & Innovation > फर्श से अर्श तक > “सड़क पर संतरे से शुरू, अब 400 करोड़ ट्रांसपोर्ट सम्राज्य के बादशाह: प्यारे खान की हैरतअंगेज़ कहानी”
फर्श से अर्श तक

“सड़क पर संतरे से शुरू, अब 400 करोड़ ट्रांसपोर्ट सम्राज्य के बादशाह: प्यारे खान की हैरतअंगेज़ कहानी”

Last updated: 10/07/2025 5:21 PM
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Industrial empire correspondent
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From Oranges to Empire: प्यारे खान का प्रेरणादायक सफर
साल 1995, नागपुर का रेलवे स्टेशन। चिलचिलाती गर्मी में एक 13 साल का लड़का संतरे बेच रहा था। जेब में हर दिन के 50-60 रुपये की बचत, आंखों में बड़े सपने। उस बच्चे का नाम था प्यारे खान। आज वही प्यारे खान “अश्मी रोड ट्रांसपोर्ट” नाम की 400 करोड़ रुपये सालाना टर्नओवर वाली ट्रांसपोर्ट कंपनी के फाउंडर और एमडी हैं। जिनके पास खुद के 300 से ज्यादा ट्रक और एक इंटरनेशनल ट्रकिंग नेटवर्क है जो नेपाल, भूटान और बांग्लादेश तक फैला है।

बचपन की तंगी, संघर्षों की लहर
प्यारे खान नागपुर के स्लम इलाके में पले-बढ़े। पिताजी गांव-गांव जाकर कपड़े बेचते थे, लेकिन आमदनी न के बराबर। मां ने छोटी-सी किराने की दुकान शुरू की ताकि बच्चों का पेट पल सके। पढ़ाई में मन तो था लेकिन हालात ने रास्ता बदल दिया। 10वीं फेल होने के बाद प्यारे ने पढ़ाई छोड़ दी और कम उम्र में ही काम की तलाश शुरू कर दी। रेलवे स्टेशन पर संतरे बेचना हो या कारों की सफाई, प्यारे ने हर छोटा-बड़ा काम किया। जिंदगी ने उन्हें हर मोड़ पर परखा, लेकिन हर बार उन्होंने हालात से बड़ा बनने का रास्ता चुना।

2005: जब एक ट्रक से शुरू हुआ सपना
एक्सीडेंट के बाद ड्राइविंग की नौकरी छोड़ने के बाद, प्यारे खान ने 2005 में खुद का पहला ट्रक खरीदा। दो साल में 12 ट्रक हो गए और 2007 में “अश्मी रोड ट्रांसपोर्ट” का रजिस्ट्रेशन कराया। उन्होंने उन रूट्स पर माल ढुलाई शुरू की जहां बड़े प्लेयर जाने से डरते थे। “जहां रिस्क होता है, वहीं ग्रोथ भी होती है” यही उनकी सोच थी। आज प्यारे का नेटवर्क करीब 2000 ट्रकों को संभालता है। 700 से ज्यादा लोग उनकी कंपनी में काम करते हैं और उनका अगला टारगेट 1000 करोड़ रुपये का कारोबार है।

कोरोना काल में बना “ऑक्सीजन मैन”
जब देश कोरोना की दूसरी लहर से जूझ रहा था और ऑक्सीजन के लिए त्राहि-त्राहि मची थी, प्यारे खान एक बार फिर आगे आए। इस बार सिर्फ कारोबारी नहीं, बल्कि “मसीहा” बनकर। उन्होंने नागपुर और आसपास के अस्पतालों में 400 मीट्रिक टन से ज्यादा मेडिकल ऑक्सीजन मुफ्त में पहुंचाई। कई करोड़ रुपये का खर्च सिर्फ इसलिए कि कोई मरीज ऑक्सीजन की कमी से न मरे। उन्होंने अपने संसाधनों को पानी की तरह बहाया, बस एक ही सोच के साथ: “जान बचेगी, तो कल फिर कमा लेंगे।”

प्यारे खान कहते हैं…
“मैं कभी भी सफलता के पीछे नहीं भागा। मैंने हमेशा सिर्फ मेहनत की और यही मेरी सफलता का राज है।”

नतीजा: संघर्ष से संकल्प तक की कहानी
प्यारे खान की कहानी सिर्फ एक सफल बिज़नेसमैन की नहीं, बल्कि हर उस भारतीय युवा की प्रेरणा है जो कम साधनों के बावजूद बड़ा सपना देखता है। यह सफर सिर्फ नागपुर का नहीं, पूरे भारत के उस जज्बे का प्रतीक है, जो कहता है – “अगर इरादे बुलंद हों, तो रेलवे स्टेशन पर संतरे बेचने वाला भी इंडस्ट्री का सम्राट बन सकता है।”

TAGGED:Businessbusiness storyFrom Oranges to EmpireIndustrial EmpireOrangesoxygen manpyare khan
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