प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालते ही कहा था – “ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा”। लेकिन तमिलनाडु से आई एक खबर इस नारे पर सवाल खड़े कर रही है। चेन्नई कस्टम विभाग (Chennai Customs) पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए एक लॉजिस्टिक्स कंपनी Wintrack Inc ने बड़ा फैसला लिया है। कंपनी ने घोषणा की है कि वह 1 अक्टूबर से भारत में अपना आयात-निर्यात कारोबार पूरी तरह बंद कर देगी।
कंपनी ने लगाए गंभीर आरोप
कंपनी का कहना है कि पिछले 45 दिनों से उन्हें चेन्नई कस्टम ऑफिस में लगातार उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। यही कारण है कि उन्होंने भारत में अपना धंधा समेटने का फैसला किया। Wintrack Inc ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट कर आरोप लगाया कि इस साल दो बार रिश्वत मांगने की शिकायत उजागर करने के बाद कस्टम अधिकारियों ने उनसे बदला लिया।
कंपनी का कहना है कि इस रवैये ने उनके कारोबार को पंगु बना दिया और भारत में बिज़नेस करना लगभग असंभव कर दिया। उनकी साफ शिकायत है “भारत में कारोबार करना आसान नहीं है, शासन के हर स्तर पर केवल भ्रष्टाचार है।”
कंपनी फाउंडर का आरोप: रिश्वत मांगने की कोशिश
कंपनी के फाउंडर प्रवीन गणेशन ने भी इस मुद्दे पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि उनकी पत्नी की कंपनी को 6,993 अमेरिकी डॉलर (करीब 5.8 लाख रुपये) के शिपमेंट के लिए 2.1 लाख रुपये से ज्यादा की रिश्वत देने पर मजबूर किया गया। यही नहीं, प्रवीन का कहना है कि अधिकारियों ने उनसे बातचीत में 10% तक “छूट” देने की पेशकश की थी।
नेताओं और उद्योगपतियों की प्रतिक्रिया
यह मुद्दा सामने आते ही सोशल मीडिया पर बड़ी हलचल मच गई। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस घटना को निराशाजनक बताया। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार अभी भी गहराई से फैला हुआ है और ज़्यादातर कंपनियां इसे व्यापार करने की कीमत मानकर स्वीकार कर लेती हैं।
इंफोसिस के पूर्व सीएफओ और आरिन कैपिटल के चेयरमैन मोहनदास पई ने भी नाराज़गी जताई। उन्होंने पीएम मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को टैग करते हुए लिखा – “आप हमारे बंदरगाहों में व्यवस्थागत भ्रष्टाचार को खत्म करने में विफल रहे हैं। कृपया कार्रवाई करें।”
कस्टम विभाग ने खारिज किए आरोप
चेन्नई कस्टम्स ने इन आरोपों को पूरी तरह नकार दिया। विभाग ने X पर आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा कि Wintrack Inc को गलत वर्गीकरण (Misclassification) और अनघोषित सामान (undeclared USB charging cables) के कारण रोका गया था। इसके अलावा, कंपनी बैटरी अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2022 के तहत जरूरी EPR प्रमाणन भी नहीं दे पाई थी।
कस्टम विभाग ने कहा कि उन्होंने कंपनी को सुनवाई का पूरा मौका दिया और डेमरेज (देरी शुल्क) कम करने के लिए बॉन्डिंग की सुविधा भी दी। बयान में साफ कहा गया “किसी भी अधिकारी ने रिश्वत नहीं मांगी। आयातक नियम तोड़ते हैं और पकड़े जाने पर झूठे भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं।”
मामला क्यों बना सुर्खियों में?
दरअसल, भारत लंबे समय से “Ease of Doing Business” को लेकर बड़ी-बड़ी घोषणाएं करता रहा है। लेकिन Wintrack Inc का यह ऐलान सवाल खड़े करता है कि क्या जमीनी स्तर पर व्यापार करना वाकई आसान है? जहां सरकार निवेश बढ़ाने और विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने के प्रयास कर रही है, वहीं इस तरह के आरोप विदेशी निवेशकों की धारणा को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
आगे की रणनीति
अब निगाहें केंद्र सरकार पर हैं। विपक्ष और उद्योग जगत सरकार से कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। यदि यह मामला दबा दिया गया तो विदेशी निवेशकों के बीच भारत की छवि को बड़ा झटका लग सकता है। सरकार और वित्त मंत्रालय को इस मुद्दे पर सख्त जांच और पारदर्शी समाधान की दिशा में कदम उठाना होगा, वरना “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” का सपना सिर्फ नारेबाज़ी बनकर रह जाएगा।
Wintrack Inc के आरोपों ने कस्टम विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि विभाग ने आरोपों को खारिज किया है, लेकिन सच्चाई जो भी हो, यह साफ है कि विदेशी कंपनियों का विश्वास बनाए रखना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। बेहतर कारोबारी माहौल और भ्रष्टाचार-मुक्त सिस्टम ही भारत की वैश्विक साख को मजबूत कर सकते हैं।