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The Industrial Empire - उद्योग, व्यापार और नवाचार की दुनिया | The World of Industry, Business & Innovation > फार्मा > Cancer treatment: कैंसर के इलाज में आया बदलाव, कीमोथेरेपी के आलावा प्रिसिजन मेडिसिन नए विकल्प
फार्मा

Cancer treatment: कैंसर के इलाज में आया बदलाव, कीमोथेरेपी के आलावा प्रिसिजन मेडिसिन नए विकल्प

Last updated: 26/12/2025 2:01 PM
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Industrial Empire
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भारत में कैंसर इलाज में बदलाव: प्रिसिजन मेडिसिन और इम्यूनोथेरेपी का बढ़ता इस्तेमाल
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Cancer treatment: भारत में कैंसर के इलाज की तस्वीर तेज़ी से बदल रही है। वर्षों तक कीमोथेरेपी पर निर्भर रहे उपचार मॉडल से अब देश निर्णायक रूप से प्रिसिजन मेडिसिन, इम्यूनोथेरेपी और आधुनिक लक्षित उपचारों की ओर बढ़ रहा है। हालिया नियामकीय मंजूरियां और अंतिम चरण में चल रही समीक्षाएं इस बदलाव को और तेज कर रही हैं। खासतौर पर फेफड़े, स्तन, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और लिवर जैसे हाई-इंसिडेंस कैंसर में नए विकल्प सामने आ रहे हैं, जिससे न सिर्फ मरीजों के लिए उम्मीद बढ़ी है बल्कि भारत का ऑन्कोलॉजी बाजार भी एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है।

अब इलाज का फोकस केवल कैंसर कोशिकाओं को मारने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि मरीज के ट्यूमर की जेनेटिक प्रोफाइल, बायोमार्कर और शरीर की इम्यून प्रतिक्रिया को समझकर दवाएं चुनी जा रही हैं। इसे ही प्रिसिजन मेडिसिन कहा जाता है। इस बदलाव में इम्यूनोथेरेपी, एंटीबॉडी-ड्रग कंजुगेट्स (ADC) और टारगेटेड थेरेपी की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये आधुनिक उपचार न सिर्फ ज्यादा प्रभावी हैं, बल्कि कई मामलों में पारंपरिक कीमोथेरेपी की तुलना में कम साइड इफेक्ट भी देते हैं।

एजहाइका ग्रुप की फार्मा विश्लेषक निराली शाह के अनुसार, भारत का ऑन्कोलॉजी इकोसिस्टम अब स्पष्ट रूप से ज्यादा नियोजित और वैज्ञानिक उपचार की दिशा में बढ़ रहा है। ट्यूमर-एग्नोस्टिक ADC, नई पीढ़ी के टायरोसिन काइनेज इनहिबिटर और इम्यूनोथेरेपी दवाओं को मिल रही मंजूरियां इस संरचनात्मक बदलाव को रेखांकित करती हैं। खासतौर पर एमएसडी की पेम्ब्रोलिजुमाब (कीट्रूडा) के लिए संकेतों के विस्तार ने इम्यूनो-ऑन्कोलॉजी के महत्व को और मजबूत किया है।

नियामकीय स्तर पर भी गतिविधियां तेज हो गई हैं। कई इम्यूनो-ऑन्कोलॉजी कॉम्बिनेशन, ADC और टारगेटेड एजेंट इस साल की दूसरी छमाही में सीडीएससीओ (CDSCO) की समीक्षा के लिए तैयार हैं। इन संभावित मंजूरियों से फेफड़े, स्तन और पाचन तंत्र से जुड़े कैंसर के इलाज में विकल्पों का दायरा काफी बढ़ने की उम्मीद है। इससे डॉक्टरों को हर मरीज के लिए ज्यादा व्यक्तिगत और प्रभावी उपचार रणनीति अपनाने का मौका मिलेगा।

हाल के महीनों में पहले ही कई अहम मंजूरियां मिल चुकी हैं, जिन्होंने बाजार और इलाज दोनों पर असर डाला है। ब्रेन कैंसर के लिए सर्वियर इंडिया की वोरासिडेनिब को मंजूरी मिलना एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। वहीं, लिवर कैंसर (हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा) और मेलेनोमा में इपिलिमुमाब और निवोलुमाब की कॉम्बिनेशन इम्यूनोथेरेपी को स्वीकृति मिलने से उन्नत चरण के मरीजों के लिए नई उम्मीद जगी है। कीट्रूडा के संकेत विस्तार ने भी कई प्रकार के कैंसर में इसके उपयोग को बढ़ा दिया है।

इसके अलावा, सेल्परकेटिनिब और एस्ट्राजेनेका की ट्रास्टुजुमाब डेरक्सटेकन जैसी दवाओं को नियामकीय मंजूरी मिलना स्तन और गैस्ट्रिक कैंसर के इलाज में प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी की मौजूदगी को और मजबूत करता है। ये दवाएं खास जेनेटिक म्यूटेशन या प्रोटीन टारगेट्स पर काम करती हैं, जिससे इलाज ज्यादा सटीक और असरदार बनता है।

इस पूरे बदलाव का असर सिर्फ दवाओं तक सीमित नहीं है। भारत का ऑन्कोलॉजी बाजार अब तेजी से बढ़ती प्रतिस्पर्धा, इनोवेशन और निवेश का केंद्र बनता जा रहा है। घरेलू और वैश्विक फार्मा कंपनियां नए उपचार लाने, क्लिनिकल ट्रायल बढ़ाने और भारत को एक महत्वपूर्ण ऑन्कोलॉजी हब के रूप में विकसित करने पर जोर दे रही हैं।

इससे स्पष्ट है कि, भारत में कैंसर इलाज अब एक संक्रमण काल से गुजर रहा है – जहां पुरानी कीमोथेरेपी आधारित सोच से निकलकर ज्यादा स्मार्ट, टारगेटेड और मरीज-केंद्रित उपचार की ओर कदम बढ़ चुके हैं। आने वाले वर्षों में यह बदलाव सर्वाइवल रेट सुधारने में मदद करेगा, कैंसर को एक नियंत्रित और बेहतर तरीके से प्रबंधित की जाने वाली बीमारी बनाने की दिशा में भी कारगर साबित होगा।

TAGGED:cancer treatmentFeaturedHealthIndustrial EmpireOncologyPHARMAPrecision Medicine
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