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The Industrial Empire - उद्योग, व्यापार और नवाचार की दुनिया | The World of Industry, Business & Innovation > आईटी > नए लेबर कोड्स से IT दिग्गजों को बड़ा झटका, Q3 में ₹4373 करोड़ का अतिरिक्त बोझ
आईटी

नए लेबर कोड्स से IT दिग्गजों को बड़ा झटका, Q3 में ₹4373 करोड़ का अतिरिक्त बोझ

Last updated: 15/01/2026 5:29 PM
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Industrial Empire
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नए लेबर कोड्स से IT कंपनियों TCS, Infosys और HCLTech पर बढ़ा खर्च और Q3 में मुनाफे पर असर
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देश की सबसे बड़ी IT कंपनियों—टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), इंफोसिस (Infosys) और एचसीएलटेक (HCLTech)—को नए लेबर कोड्स के लागू होने से बड़ा वित्तीय झटका लगा है। चालू वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही (अक्टूबर–दिसंबर 2025) में इन तीनों कंपनियों पर कुल मिलाकर ₹4373 करोड़ का अतिरिक्त खर्च आया है, जिसका सीधा असर उनके मुनाफे पर दिखा।

दिसंबर तिमाही में मुनाफे पर दबाव
जनवरी के मध्य में घोषित तिमाही नतीजों से साफ हुआ कि नए लेबर कोड्स ने आईटी सेक्टर की लागत संरचना को झकझोर दिया है। 14 जनवरी को इंफोसिस ने बताया कि दिसंबर तिमाही में उसे ₹1,289 करोड़ का एक्सेप्शनल खर्च उठाना पड़ा। इससे पहले 12 जनवरी को टीसीएस ने ₹2,128 करोड़ और एचसीएलटेक ने ₹956 करोड़ के अतिरिक्त खर्च की जानकारी दी थी। इन खर्चों के कारण तीनों कंपनियों के मुनाफे में दोहरे अंकों की गिरावट देखने को मिली।

मार्जिन पर असर
हालांकि इतना बड़ा खर्च होने के बावजूद ऑपरेटिंग मार्जिन के मोर्चे पर तस्वीर पूरी तरह खराब नहीं रही। टीसीएस ने तिमाही आधार पर 25.2% का ऑपरेटिंग मार्जिन बनाए रखा। इंफोसिस का ऑपरेटिंग मार्जिन 21% से घटकर 18.4% पर आ गया। कंपनी का कहना है कि अगर नए लेबर कोड्स से जुड़ा खर्च न होता, तो मार्जिन 21.2% तक रह सकता था। वहीं एचसीएलटेक ने भी माना कि मार्जिन पर असर पड़ा है, लेकिन आगे यह दबाव सीमित रह सकता है।

क्या हैं नए लेबर कोड्स?
नवंबर 2025 में लागू हुए नए लेबर कोड्स का मकसद कर्मचारियों की सैलरी संरचना, कार्यस्थल सुरक्षा और सोशल सिक्योरिटी को अधिक मजबूत बनाना है। खास तौर पर आईटी और आईटीईएस सेक्टर के लिए इन नियमों के तहत कई अहम बदलाव किए गए हैं। अब कर्मचारियों की कुल CTC का कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा बेसिक सैलरी के रूप में देना अनिवार्य कर दिया गया है, जिससे ग्रेच्यूटी और पीएफ जैसे लाभ सीधे प्रभावित होते हैं।

इसके साथ ही फिक्स्ड-टर्म एंप्लॉयमेंट के तहत सोशल सिक्योरिटी सुविधाएं, तय वर्किंग ऑवर्स और महिलाओं को नाइट शिफ्ट में काम करने की अनुमति जैसे प्रावधान भी जोड़े गए हैं। इन सभी बदलावों का संयुक्त असर यह हुआ है कि आईटी कंपनियों की एंप्लॉयी कॉस्ट पहले की तुलना में काफी बढ़ गई है।

कंपनियों का क्या कहना है?
टीसीएस के सीएफओ समीर सेकसरिया ने बताया कि कंपनी के ₹2128 करोड़ के खर्च में से करीब ₹1800 करोड़ ग्रेच्यूटी और लगभग ₹300 करोड़ लीव लायबिलिटी से जुड़े थे। उनका कहना है कि आगे इसका असर 10–15 बेसिस प्वाइंट्स तक सीमित रहेगा। इंफोसिस के सीएफओ जयेश संघराजका के मुताबिक, नए लेबर कोड्स का सालाना असर लगभग 15 बेसिस प्वाइंट्स का हो सकता है। एचसीएलटेक के सीईओ सी विजयकुमार ने भी कहा कि भविष्य में इसका प्रभाव 10–20 बेसिस प्वाइंट्स के दायरे में रहने की संभावना है।

ब्रोकरेज फर्म्स की चेतावनी
वैश्विक ब्रोकरेज फर्म Jefferies का मानना है कि यह खर्च पूरी तरह एकमुश्त नहीं है। आगे चलकर आईटी कंपनियों के मार्जिन पर लगातार दबाव बना रह सकता है। ब्रोकरेज के मुताबिक, नए नियमों के चलते रिकरिंग एंप्लॉयी कॉस्ट बढ़ेगी और इसका असर सैलरी हाइक पर भी पड़ सकता है। Jefferies का अनुमान है कि अगर कर्मचारियों की लागत 2% बढ़ती है, तो वित्त वर्ष 2027 में आईटी कंपनियों की कमाई के अनुमानों में 2–4% तक की कटौती हो सकती है। ऐसे में कंपनियां खासकर सीनियर लेवल पर सैलरी बढ़ोतरी की रफ्तार धीमी कर सकती हैं।

आगे की संभावना
विशेषज्ञों का मानना है कि नए लेबर कोड्स ने आईटी सेक्टर को एक नई वास्तविकता से रूबरू कराया है। जहां एक तरफ कर्मचारियों को ज्यादा सुरक्षा और स्थिरता मिलेगी, वहीं कंपनियों को अपने बिजनेस मॉडल और लागत प्रबंधन पर दोबारा विचार करना होगा। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि आईटी कंपनियां बढ़ती लागत, सुस्त रेवेन्यू ग्रोथ और एआई आधारित बदलावों के बीच अपने मार्जिन को कैसे संभालती हैं।

TAGGED:HCLTechIndustrial EmpireInfosysITIT Employees CostLabour CodesTCS
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