भारत के बिजली क्षेत्र को अगले दो दशकों में पूरी तरह बदलने की दिशा में सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्र सरकार ने नई नेशनल इलेक्ट्रिसिटी पॉलिसी (National Electricity Policy) का मसौदा जारी किया है, जिसमें पावर प्रोडक्शन, ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर में बड़े सुधारों और भारी निवेश की रूपरेखा रखी गई है। ड्राफ्ट के मुताबिक, 2032 तक करीब ₹50 लाख करोड़ और 2047 तक लगभग ₹200 लाख करोड़ रुपये का निवेश बिजली क्षेत्र में किया जाएगा। इस पॉलिसी का मुख्य उद्देश्य बिजली सेक्टर को वित्तीय रूप से मजबूत बनाना, उपभोक्ताओं को भरोसेमंद सप्लाई देना और भारत की ऊर्जा जरूरतों को भविष्य के अनुरूप तैयार करना है।
2047 तक बिजली खपत और ग्रीन एनर्जी पर फोकस
ड्राफ्ट पॉलिसी के अनुसार, सरकार का लक्ष्य है कि 2047 तक प्रति व्यक्ति बिजली खपत को 4,000 यूनिट (kWh) तक पहुंचाया जाए। इसके साथ ही गैर-जीवाश्म ऊर्जा यानी सोलर, विंड और अन्य ग्रीन एनर्जी की हिस्सेदारी को तेजी से बढ़ाने पर जोर दिया गया है। पॉलिसी यह भी मानती है कि आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, डेटा सेंटर्स, ग्रीन हाइड्रोजन और औद्योगिक विस्तार के कारण बिजली की मांग कई गुना बढ़ने वाली है। ऐसे में समय रहते पावर सेक्टर को मजबूत बनाना जरूरी है।
डिस्कॉम की बिगड़ती हालत बनी बड़ी चुनौती
नई पॉलिसी में बिजली वितरण कंपनियों यानी डिस्कॉम की कमजोर वित्तीय स्थिति को खुलकर स्वीकार किया गया है। ड्राफ्ट के मुताबिक, देशभर की डिस्कॉम पर इस समय करीब ₹6.9 लाख करोड़ का घाटा है और उनका कुल बकाया कर्ज ₹7.18 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। सरकार का मानना है कि मौजूदा बिजली दरें लागत के अनुरूप नहीं हैं। क्रॉस-सब्सिडी की वजह से उद्योगों को महंगी बिजली मिल रही है, जिससे भारतीय उत्पादों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो रही है।
पावर डिस्ट्रीब्यूशन में खत्म होगा एकाधिकार
नई National Electricity Policyका सबसे बड़ा बदलाव डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर में प्रतिस्पर्धा लाने को लेकर है। ड्राफ्ट में एक ही इलाके में एक से ज्यादा बिजली सप्लायरों को अनुमति देने का प्रस्ताव रखा गया है। इससे उपभोक्ताओं को विकल्प मिलेंगे और सेवाओं की गुणवत्ता बेहतर होने की उम्मीद है। इसके अलावा, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) को बढ़ावा देने, डिस्ट्रिब्यूशन कंपनियों को शेयर बाजार में लिस्ट करने और निजी निवेश आकर्षित करने पर भी जोर दिया गया है।
समय पर टैरिफ और पारदर्शी व्यवस्था
ड्राफ्ट पॉलिसी में यह अनिवार्य करने का प्रस्ताव है कि हर वित्त वर्ष की शुरुआत से पहले टैरिफ ऑर्डर जारी किया जाए। पिछले साल के खर्चों का समायोजन उसी साल किया जाएगा और डिस्ट्रीब्यूशन व सप्लाई टैरिफ को अलग-अलग दिखाया जाएगा। नियामकीय प्रक्रिया को 120 दिनों के भीतर पूरा करने की व्यवस्था का सुझाव भी दिया गया है, ताकि अनिश्चितता कम हो और निवेशकों का भरोसा बढ़े।
FY27 से पूरी तरह लागत आधारित होंगी बिजली दरें
सरकार ने संकेत दिया है कि FY27 से बिजली दरें पूरी तरह लागत आधारित होंगी और रेगुलेटरी एसेट बनाने से बचा जाएगा। अगर राज्य नियामक आयोग समय पर टैरिफ तय नहीं करता है, तो ऑटोमैटिक सालाना टैरिफ संशोधन लागू किया जा सकेगा। इसके अलावा, बिजली खरीद लागत में बढ़ोतरी को हर महीने सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाने और उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए स्टेबलाइजेशन फंड बनाने का भी प्रस्ताव है।
ग्रीन एनर्जी के लिए विशेष फंड और गारंटी
नई पॉलिसी में ग्रीन और नॉन-फॉसिल एनर्जी परियोजनाओं के लिए पूंजी जुटाने पर खास जोर दिया गया है। इसके तहत NaBFID और NIIF के माध्यम से विशेष ऊर्जा क्षेत्र फंड बनाने का प्रस्ताव है। निवेश को सुरक्षित बनाने के लिए फर्स्ट-लॉस गारंटी, रिजर्व फंड और मल्टीलेटरल डेवलपमेंट बैंकों से मिलने वाली गारंटी जैसे उपायों को अपनाने की बात कही गई है।
बिजली सेक्टर के लिए दीर्घकालिक बदलाव की तैयारी
नई National Electricity Policy का ड्राफ्ट यह संकेत देता है कि सरकार बिजली सेक्टर को सिर्फ सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धी, निवेश योग्य और भविष्य के लिए तैयार उद्योग के रूप में विकसित करना चाहती है। अगर यह पॉलिसी जमीन पर सही तरीके से लागू होती है, तो आने वाले वर्षों में भारत का पावर सेक्टर आर्थिक विकास की मजबूत रीढ़ बन सकता है।