भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने चालू वित्त वर्ष में अब तक का सबसे बड़ा लिक्विडिटी इंजेक्शन किया है, लेकिन इसके बावजूद बाजार में ब्याज दरों में वैसी नरमी नहीं दिख रही, जैसी आमतौर पर इतनी बड़ी राहत के बाद देखने को मिलती है। SBI रिसर्च की ताजा Ecowrap रिपोर्ट में इस असंतुलन पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, RBI ने इस वित्त वर्ष में करीब 5.5 लाख करोड़ रुपये की शुद्ध लिक्विडिटी सिस्टम में डाली है, फिर भी बॉन्ड और मनी मार्केट में दबाव बना हुआ है।
RBI ने रिकॉर्ड लिक्विडिटी डाली, फिर भी असर सीमित
SBI रिसर्च के अनुसार, RBI ने रेपो रेट में 125 बेसिस पॉइंट की कटौती की है। इसके अलावा ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO), CRR में ढील, बॉय-सेल स्वैप और अन्य नीतिगत उपायों के जरिए बाजार में भरपूर नकदी डाली गई। इसके बावजूद 10 साल की सरकारी और कॉरपोरेट बॉन्ड यील्ड में अपेक्षित गिरावट नहीं आई। रिपोर्ट का कहना है कि इतनी बड़ी राहत के बाद भी अगर बाजार दरें नीचे नहीं आतीं, तो यह लिक्विडिटी ट्रांसमिशन की कमजोरी को दिखाता है।
बैंक लोन सस्ते हुए, कंपनियों की पसंद बदली
हालांकि, रिपोर्ट में एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया है। बैंक लोन की ब्याज दरों में तेज गिरावट दर्ज की गई है, जिससे कंपनियां फिर से बैंकों की ओर रुख कर रही हैं। SBI रिसर्च के मुताबिक, AAA रेटिंग वाले 10 साल के कॉरपोरेट बॉन्ड और बैंक लेंडिंग रेट (WALR) के बीच का अंतर अप्रैल 2024 में करीब 200 बेसिस पॉइंट था, जो नवंबर 2025 तक घटकर 150 बेसिस पॉइंट रह गया है। इससे साफ है कि कंपनियों के लिए बॉन्ड जारी करने की तुलना में बैंक से कर्ज लेना अब ज्यादा सस्ता और आसान हो गया है।
EBLR सिस्टम ने लोन दरों को नीचे खींचा
रिपोर्ट बताती है कि बैंकिंग सिस्टम में करीब 65 प्रतिशत लोन EBLR (External Benchmark Lending Rate) से जुड़े हुए हैं। इसका फायदा यह हुआ कि रेपो रेट में कटौती का असर तेजी से लोन दरों पर पड़ा। नवंबर 2025 तक फ्रेश रुपया लोन पर औसत ब्याज दर (WALR) घटकर 8.71 प्रतिशत रह गई है। यह 2025 के दौरान करीब 62 बेसिस पॉइंट की गिरावट को दर्शाता है।
मनी मार्केट और बॉन्ड मार्केट में क्यों बढ़ा दबाव?
जहां बैंक लोन सस्ते हुए, वहीं मनी मार्केट में तस्वीर अलग नजर आई। रिपोर्ट के अनुसार, कमर्शियल पेपर (CP), सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CD) और NBFC बॉरोइंग रेट्स पहले गिरे जरूर, लेकिन अगस्त 2025 के बाद इनमें दोबारा तेजी देखने को मिली। दिसंबर 2025 में भी कई मनी मार्केट दरें नवंबर के मुकाबले ऊंची रहीं, जबकि उसी दौरान RBI ने नीति में और ढील दी थी। इससे संकेत मिलता है कि बाजार अब ज्यादा जोखिम प्रीमियम मांग रहा है।
राज्यों की उधारी अब भी महंगी
SBI रिसर्च ने राज्य सरकारों की उधारी लागत पर भी चिंता जताई है। अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच स्टेट डेवलपमेंट लोन (SDL) पर औसत ब्याज दर 7.16 प्रतिशत रही, जो पिछले साल के मुकाबले सिर्फ 7 बेसिस पॉइंट कम है। रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक को सबसे ऊंची दरों पर कर्ज लेना पड़ा। वहीं बिहार, झारखंड, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और केरल जैसे राज्यों की उधारी लागत भी औसत से ऊपर बनी हुई है।
OMO रणनीति में बदलाव की जरूरत
SBI रिसर्च का मानना है कि अगर इतनी बड़ी लिक्विडिटी डालने के बावजूद यील्ड नीचे नहीं आ रही हैं, तो RBI को अपनी OMO रणनीति पर दोबारा विचार करना चाहिए। रिपोर्ट सुझाव देती है कि RBI को सबसे ज्यादा ट्रेड होने वाले और ज्यादा लिक्विड सरकारी बॉन्ड में OMO करना चाहिए, ताकि यील्ड कर्व को स्पष्ट संकेत मिले और बाजार में भरोसा मजबूत हो।
सेंट्रल बैंकों का सोने की ओर झुकाव भी अहम संकेत
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दुनियाभर के सेंट्रल बैंक अपने रिजर्व में सोने की हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं, जो 1960 और 1970 के दशक जैसे हालात की याद दिलाता है। SBI रिसर्च के मुताबिक, यह वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता का बड़ा संकेत है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लिक्विडिटी है, लेकिन ट्रांसमिशन कमजोर
SBI रिसर्च की रिपोर्ट यह साफ करती है कि इतिहास की सबसे बड़ी लिक्विडिटी इंजेक्शन के बावजूद ब्याज दरों में समान रूप से राहत नहीं दिख रही है। बैंक लोन जरूर सस्ते हुए हैं, लेकिन मनी मार्केट और बॉन्ड मार्केट में अब भी दबाव कायम है। ऐसे में RBI के सामने लिक्विडिटी मैनेजमेंट और OMO रणनीति को नए सिरे से मजबूत करने की चुनौती खड़ी है।