Success Story: ओडिशा के खोर्धा जिले से निकलकर काशीनाथ जेना और उनकी पत्नी अनुसूया जेना ने यह साबित कर दिया है कि अगर सोच सही हो, तो कचरा भी कमाई का बड़ा जरिया बन सकता है। जिस केले के तने को किसान खेत से हटाने के लिए पैसे खर्च करते थे या जला देते थे, आज वही तना इस कपल के लिए करोड़ों के बिजनेस की नींव बन गया है। यह कहानी सिर्फ एक स्टार्टअप की नहीं, बल्कि “वेस्ट-टू-वेल्थ मॉडल” की एक प्रेरक मिसाल है।
जब समस्या में दिखा मौका
काशीनाथ जेना जब अपने गांव पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि इलाके में उपजाऊ मिट्टी के कारण केले की खेती खूब हो रही है। लेकिन फसल कटाई के बाद खेतों में बचे केले के भारी-भरकम तने किसानों के लिए बड़ी परेशानी बने हुए थे। केला सिर्फ एक बार फल देता है और उसके बाद उसका तना बेकार हो जाता है। किसान इसे हटाने के लिए मजदूरी देते थे या मजबूरी में जला देते थे, जिससे प्रदूषण भी बढ़ता था। यहीं से काशीनाथ के दिमाग में एक सवाल उठा – क्या इस “बेकार” समझे जाने वाले तने का कोई उपयोग नहीं हो सकता?
रिसर्च से शुरू हुआ सफर
इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए काशीनाथ जेना ने देश के कई राज्यों का दौरा किया। उन्होंने केले के तने से निकलने वाले फाइबर, उसके खाद्य उपयोग और पारंपरिक उत्पादों पर गहराई से अध्ययन किया। इस रिसर्च में उनकी पत्नी अनुसूया जेना भी बराबर की भागीदार रहीं। दोनों ने मिलकर तय किया कि वे इस समस्या को अवसर में बदलेंगे। साल 2021 में इस सोच ने एक स्टार्टअप का रूप लिया – “जयदेव बनाना फार्मर्स एंड आर्टिसन्स एसोसिएशन”।
जीरो-वेस्ट मॉडल बना पहचान
आज यह स्टार्टअप हर महीने करीब 300 टन केले के कचरे को प्रोसेस करता है। खास बात यह है कि इस बिजनेस में लगभग कोई भी कचरा नहीं बचता। केले के तने के अंदरूनी नरम हिस्से से जूस, अचार और मुरब्बा जैसे खाद्य उत्पाद बनाए जाते हैं। वहीं, बाहरी परतों से फाइबर निकालकर उससे बैग, मैट, सजावटी सामान और ‘बनाना सिल्क’ जैसी चमक वाले हस्तशिल्प उत्पाद तैयार किए जाते हैं। जो हिस्सा बच जाता है, उससे जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशक बनाए जाते हैं। इस तरह यह पूरा मॉडल 100% जीरो-वेस्ट बन जाता है।
किसानों की बदली किस्मत
इस पहल का सबसे बड़ा फायदा स्थानीय किसानों को हुआ है। अब उन्हें खेत साफ कराने के लिए पैसे खर्च नहीं करने पड़ते, बल्कि हर केले के पेड़ पर 10 रुपये की अतिरिक्त कमाई भी होती है। किसानों और संस्था के बीच व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए एक मजबूत सप्लाई चेन बनाई गई है। जैसे ही किसान जानकारी देते हैं, संस्था की टीम खेत से खुद तना उठाकर ले जाती है। इससे न केवल किसानों की आमदनी बढ़ी है, बल्कि खेतों में कचरा जलाने से होने वाला प्रदूषण भी कम हुआ है।
1 करोड़ का टर्नओवर और बड़ा लक्ष्य
आर्थिक रूप से भी यह स्टार्टअप बड़ी सफलता बन चुका है। वित्त वर्ष 2024-25 में कंपनी ने 1 करोड़ रुपये का टर्नओवर हासिल किया है। फिलहाल यह मॉडल 1,000 से ज्यादा किसानों के साथ काम कर रहा है और आने वाले समय में 3,000 किसानों को जोड़ने की योजना है। काशीनाथ और अनुसूया जेना का लक्ष्य है कि 2030 तक इस बिजनेस को 10 करोड़ रुपये के टर्नओवर तक पहुंचाया जाए। उनकी इस पहल को कई राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पुरस्कार भी मिल चुके हैं।
प्रेरणा देने वाली कहानी
जेना दंपति की यह कहानी दिखाती है कि सही सोच, रिसर्च और तकनीक के साथ किसी भी समस्या को अवसर में बदला जा सकता है। उन्होंने न सिर्फ एक सफल बिजनेस खड़ा किया, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने में भी अहम योगदान दिया है। यह सफलता उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो खेती, स्टार्टअप और सस्टेनेबल बिजनेस के क्षेत्र में कुछ नया करना चाहते हैं।