Iran crisis: मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब भारत के कृषि निर्यात पर भी साफ दिखाई देने लगा है। खास तौर पर भारतीय बासमती चावल निर्यातकों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। ईरान से जुड़े मौजूदा संकट और समुद्री रास्तों पर बढ़ती अनिश्चितता के कारण निर्यातकों को लॉजिस्टिक्स, भुगतान और बढ़ती लागत जैसी कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि चावल निर्यातकों ने सरकार से तत्काल राहत देने की मांग की है। उन्होंने बंदरगाह से जुड़े शुल्कों में छूट, बैंकिंग सहायता और भुगतान व्यवस्था में लचीलापन देने जैसे कई उपाय सुझाए हैं, ताकि मौजूदा संकट से कारोबार को बचाया जा सके।
लॉजिस्टिक्स और शिपिंग में बढ़ी दिक्कतें
मौजूदा संकट का सबसे बड़ा असर लॉजिस्टिक्स और शिपिंग व्यवस्था पर पड़ा है। पश्चिम एशिया जाने वाले कई जहाज रद्द हो रहे हैं या उनकी आवाजाही में देरी हो रही है। इसके कारण निर्यातकों की खेप समय पर गंतव्य तक नहीं पहुंच पा रही है। इसके अलावा कंटेनरों की भारी कमी भी एक बड़ी समस्या बन गई है। निर्यातकों का कहना है कि पश्चिम एशिया के लिए कंटेनर मिलना मुश्किल हो गया है और अन्य अंतरराष्ट्रीय रूट्स पर भी कंटेनरों की उपलब्धता सीमित हो गई है। इससे निर्यात की लागत और समय दोनों पर दबाव बढ़ गया है।
मालभाड़ा और बीमा लागत में भारी बढ़ोतरी
समुद्री व्यापार में जोखिम बढ़ने के कारण मालभाड़ा और बीमा की लागत भी तेजी से बढ़ी है। रिपोर्ट्स के अनुसार अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लागत में करीब 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो चुकी है। खाड़ी देशों के लिए जहाज भेजने पर युद्ध जोखिम शुल्क और बीमा प्रीमियम में भी तेज बढ़ोतरी देखी जा रही है। इसके अलावा बंकर फ्यूल यानी जहाजों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन की कीमतें भी तेजी से बढ़ी हैं।
जहाजों में इस्तेमाल होने वाला समुद्री ईंधन तेल पहले करीब 520 डॉलर प्रति टन के आसपास था, जो अब बढ़कर लगभग 700 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया है। इससे निर्यातकों की लागत काफी बढ़ गई है और पहले से किए गए कॉन्ट्रैक्ट्स पर भी असर पड़ रहा है।
घरेलू बाजार में बासमती की कीमतों में गिरावट
एक तरफ निर्यात में बाधाएं बढ़ रही हैं तो दूसरी ओर घरेलू बाजार में भी बासमती चावल की कीमतों में गिरावट देखने को मिल रही है। पिछले 72 घंटों के दौरान बासमती की कीमतों में करीब 7 से 10 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। कीमतों में गिरावट से निर्यातकों पर कार्यशील पूंजी का दबाव बढ़ गया है। जब निर्यात खेप समय पर नहीं भेजी जा पाती या उसे आगे बढ़ाना पड़ता है, तब कंपनियों को मालभाड़ा, ईंधन और बीमा की बढ़ी लागत का झटका भी झेलना पड़ता है।
बंदरगाह शुल्क में छूट की मांग
भारतीय चावल निर्यातक महासंघ ने सरकार से बंदरगाह से जुड़े शुल्कों में राहत देने की मांग की है। उनका कहना है कि जहाजों के रद्द होने की वजह से कई बार कार्गो को वापस करना पड़ता है या उसका मार्ग बदलना पड़ता है। ऐसी स्थिति में बंदरगाहों पर स्टोरेज, डेमरेज और अन्य शुल्क काफी बढ़ जाते हैं। निर्यातकों का कहना है कि मौजूदा हालात को देखते हुए इन शुल्कों में अस्थायी छूट दी जानी चाहिए, ताकि कंपनियों पर आर्थिक दबाव कम हो सके।
बैंकिंग और भुगतान व्यवस्था में मदद की मांग
निर्यातकों ने सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक से भुगतान व्यवस्था में लचीलापन देने की भी मांग की है। उनका कहना है कि कई मामलों में खेप की देरी या मार्ग बदलने के कारण दस्तावेजीकरण और भुगतान से जुड़ी प्रक्रियाएं प्रभावित हो रही हैं। इसलिए निर्यातकों ने सीमा शुल्क और RBI से ट्रांजिट में कार्गो को वापस करने, मार्ग बदलने और भुगतान समायोजन जैसी प्रक्रियाओं को आसान बनाने की मांग की है।
जुर्माने से राहत की भी मांग
निर्यातकों ने सरकार से यह भी अनुरोध किया है कि मौजूदा संकट को “अपरिहार्य स्थिति” (Force Majeure) के रूप में मान्यता दी जाए। ऐसा होने पर निर्यातकों पर अनुबंध से जुड़े जुर्माने या अन्य दंडात्मक कार्रवाई का खतरा कम हो जाएगा। इसके अलावा उन्होंने कोविड-19 के दौरान दी गई राहत की तरह ही अस्थायी वर्किंग कैपिटल लिमिट और लोन विस्तार की सुविधा देने की मांग की है, ताकि निर्यातकों को तत्काल वित्तीय सहायता मिल सके।
संकट से निर्यात कारोबार पर बढ़ता दबाव
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मिडिल ईस्ट में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर भारतीय कृषि निर्यात पर और ज्यादा बढ़ सकता है। बासमती चावल के लिए खाड़ी देशों और ईरान जैसे बाजार बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में लॉजिस्टिक्स, शिपिंग और भुगतान से जुड़ी समस्याएं निर्यातकों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं। फिलहाल निर्यातक सरकार से जल्द राहत मिलने की उम्मीद कर रहे हैं, ताकि इस मुश्किल दौर में उनके कारोबार को स्थिर रखा जा सके।