West Asia War: पश्चिम एशिया में तेजी से बढ़ते सैन्य तनाव ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर किए गए हमलों के बाद क्षेत्र में संघर्ष गहराता जा रहा है। इस बीच भारत सरकार ने भी इस स्थिति के संभावित आर्थिक प्रभावों को लेकर सावधानी बरतनी शुरू कर दी है।
वित्त मंत्रालय की हालिया मासिक आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि पश्चिम एशिया में जारी यह टकराव लंबे समय तक वैश्विक आर्थिक माहौल को प्रभावित कर सकता है। रिपोर्ट के अनुसार अभी इसके पूरे प्रभाव स्पष्ट नहीं हुए हैं, लेकिन यदि संघर्ष लंबा चलता है तो इसका असर धीरे-धीरे कई आर्थिक क्षेत्रों में दिखाई दे सकता है।
महंगाई और रुपये पर पड़ सकता है दबाव
सरकार का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ता युद्ध भारत की अर्थव्यवस्था के कई अहम संकेतकों को प्रभावित कर सकता है। इनमें महंगाई दर, रुपये की विनिमय दर, व्यापार संतुलन, पूंजी प्रवाह और चालू खाता घाटा जैसे महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में अगर युद्ध के कारण ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ती है और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल आता है, तो इसका सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ेगा। इससे महंगाई बढ़ने और रुपये पर दबाव आने की आशंका भी बढ़ सकती है।
ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल की आशंका
आर्थिक समीक्षा में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ी उथल-पुथल देखने को मिल सकती है। कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ता है जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं। रिपोर्ट के अनुसार हालिया तनाव के बाद से एलएनजी की कीमतों में लगभग 9 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि कच्चे तेल की कीमतों में करीब 50 प्रतिशत तक उछाल देखा गया है। यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों दोनों पर पड़ सकता है।
उर्वरक और पेट्रोकेमिकल उद्योग पर असर
ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे कई उद्योग भी प्रभावित होते हैं। आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि उर्वरक और पेट्रोकेमिकल जैसे सेक्टर इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। इन उद्योगों में उत्पादन के लिए बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस और कच्चे तेल की जरूरत होती है। अगर इनकी कीमतें लगातार बढ़ती हैं तो उत्पादन लागत भी बढ़ेगी। इसका असर कृषि क्षेत्र और औद्योगिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि उर्वरक की कीमतें बढ़ने से खेती की लागत में इजाफा हो सकता है।
1991 के खाड़ी युद्ध से तुलना
रिपोर्ट में इस संकट की तुलना 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान पैदा हुए तेल संकट से भी की गई है। उस समय भी पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल देखने को मिली थी। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि आज भारत की आर्थिक स्थिति 1991 के मुकाबले काफी मजबूत है। देश के पास बेहतर मैक्रोइकॉनॉमिक आधार, मजबूत वित्तीय संस्थाएं और ज्यादा स्थिर आर्थिक ढांचा मौजूद है।
100 डॉलर से ऊपर तेल की कीमत बनी तो बढ़ेगी चिंता
आर्थिक समीक्षा के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था पर वास्तविक दबाव तब दिखाई दे सकता है जब कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है। इसके अलावा केवल तेल ही नहीं बल्कि प्राकृतिक गैस और रसोई गैस की आपूर्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि समुद्री मार्गों में किसी तरह की बाधा आती है तो भारत के निर्यात और पूंजी प्रवाह पर भी असर पड़ सकता है।
भुगतान संतुलन और निवेश पर असर
सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि अगर वैश्विक संकट लंबा चलता है तो भुगतान संतुलन पर दबाव बढ़ सकता है। इसके साथ ही विदेशी निवेशकों का रुख भी बदल सकता है। अंतरराष्ट्रीय संकट के दौरान निवेशक अक्सर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं। ऐसी स्थिति में उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पूंजी का बहिर्वाह बढ़ सकता है, जिससे रुपये की विनिमय दर पर दबाव आ सकता है।
मजबूत आर्थिक आधार से उम्मीद
हालांकि सरकार का मानना है कि भारत के पास इस तरह की वैश्विक चुनौतियों का सामना करने की पर्याप्त क्षमता है। देश के पास मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है और चालू खाता घाटा भी फिलहाल नियंत्रित स्तर पर है। इसके अलावा महंगाई दर भी अभी संतुलित दायरे में बनी हुई है। इन कारकों के कारण भारत ऊर्जा कीमतों में संभावित बढ़ोतरी के असर को कुछ हद तक संभाल सकता है।
भविष्य में संसाधन सुरक्षा पर बढ़ेगा फोकस
आर्थिक समीक्षा में यह भी कहा गया है कि पश्चिम एशिया का यह संकट प्राकृतिक संसाधनों के सुरक्षित भंडार की जरूरत को फिर से उजागर करता है। आने वाले वर्षों में सरकारों को ऊर्जा और अन्य महत्वपूर्ण संसाधनों के रणनीतिक भंडार पर ज्यादा ध्यान देना पड़ सकता है।
अनिश्चितताओं के बीच विकास की उम्मीद
रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां, भू-राजनीतिक घटनाएं और वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव आने वाले समय में भी आर्थिक माहौल को प्रभावित करते रहेंगे। इसके बावजूद सरकार का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बुनियाद पर खड़ी है और लगातार हो रहे आर्थिक सुधारों के कारण देश आगे भी विकास की राह पर बना रह सकता है। मौजूदा रुझानों को देखते हुए अनुमान लगाया गया है कि वित्त वर्ष 2028 तक भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है।