पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष अब सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत के कारोबार पर भी साफ दिखाई देने लगा है। खासकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSME) इस संकट की मार झेल रहे हैं। नकदी प्रवाह में बाधा और बढ़ती लागत के कारण इन कंपनियों के सामने कर्ज चुकाने की चुनौती खड़ी हो गई है। ऐसे में बैंकों ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और केंद्र सरकार से मॉरेटोरियम यानी कर्ज भुगतान में अस्थायी राहत देने की मांग तेज कर दी है।
मॉरेटोरियम की मांग क्यों बढ़ी?
बैंकरों का मानना है कि मौजूदा हालात असामान्य हैं और अगर जल्द राहत नहीं दी गई, तो कई छोटे और मझोले उद्योग वित्तीय संकट में फंस सकते हैं। प्रस्ताव यह है कि MSME और मिड-साइज़ कंपनियों को कुछ समय के लिए EMI या कर्ज भुगतान टालने की अनुमति दी जाए। इससे कंपनियों को अपनी नकदी स्थिति संभालने का समय मिलेगा और बैंकिंग सिस्टम पर भी तुरंत दबाव नहीं पड़ेगा।
सूत्रों के मुताबिक, एक नया ढांचा तैयार किया जा रहा है जिसमें जरूरतमंद कंपनियां स्वेच्छा से मॉरेटोरियम का लाभ ले सकेंगी। इससे हर केस को अलग-अलग जांचने की जरूरत नहीं पड़ेगी और प्रक्रिया तेज हो सकेगी।
कोविड जैसा मॉडल फिर आ सकता है
याद दिला दें कि कोविड-19 महामारी के दौरान भी भारतीय रिजर्व बैंक ने इसी तरह की राहत दी थी, जब देशभर में कारोबार ठप हो गया था। उस समय लोन भुगतान पर अस्थायी रोक से लाखों कंपनियों को राहत मिली थी। अब बैंकरों का कहना है कि अगर पश्चिम एशिया का संकट लंबा खिंचता है, तो उसी मॉडल को फिर से लागू किया जा सकता है।
किन सेक्टरों पर सबसे ज्यादा असर?
इस संकट का असर कई अहम उद्योगों पर पड़ रहा है। गुजरात के मोरबी का सिरैमिक क्लस्टर, जो गैस पर निर्भर है, सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है क्योंकि ऊर्जा लागत बढ़ गई है। इसके अलावा कांच उद्योग, खासकर चूड़ी बनाने वाले छोटे व्यवसाय भी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं।
पश्चिम एशिया के बाजारों पर निर्भर चावल निर्यातक भी दबाव में हैं, क्योंकि मांग और सप्लाई दोनों प्रभावित हो रही हैं। वहीं उर्वरक उद्योग को भी कच्चे माल और लागत से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कुल मिलाकर, यह संकट उन सभी सेक्टरों को प्रभावित कर रहा है जो ऊर्जा या निर्यात पर निर्भर हैं।
सरकार और RBI की नजर हालात पर
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों से उन सेक्टरों का डेटा मांगा है जो इस वैश्विक संकट से प्रभावित हो सकते हैं। वहीं केंद्र सरकार भी हालात पर नजर बनाए हुए है और बैंकों से सुझाव ले रही है। एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी के अनुसार, RBI और सरकार मिलकर राहत पैकेज पर काम कर रहे हैं। अगर हालात नहीं सुधरे, तो एक से दो महीने या स्थिति सामान्य होने तक मॉरेटोरियम दिया जा सकता है।
फिलहाल बैंकिंग सिस्टम सुरक्षित, लेकिन खतरा बरकरार
अभी तक बैंकों के लोन पोर्टफोलियो में कोई बड़ी समस्या सामने नहीं आई है और एसेट क्वालिटी स्थिर बनी हुई है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अगर संकट जारी रहता है, तो अप्रैल-जून तिमाही में असर दिख सकता है। RBI के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2026 तक MSME सेक्टर में बैंकों का कुल कर्ज 14.57 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है, जो इसकी अहमियत को दर्शाता है।
गोल्ड लोन भी बना चिंता का विषय
खुदरा ऋण के मोर्चे पर भी एक नई चुनौती उभर रही है। हाल के समय में सोने की कीमतों में गिरावट के कारण गोल्ड लोन पर जोखिम बढ़ गया है। जब सोने की कीमत गिरती है, तो लोन-टू-वैल्यू अनुपात बिगड़ जाता है। ऐसे में बैंकों को उधार लेने वालों से अतिरिक्त सोना गिरवी रखने या कुछ रकम चुकाने के लिए कहना पड़ रहा है।
कैसी होगी रहत योजना?
पश्चिम एशिया संकट ने भारतीय MSME सेक्टर के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। अब सबकी नजर इस बात पर है कि भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार किस तरह की राहत योजना लेकर आते हैं। अगर समय रहते कदम उठाए गए, तो छोटे उद्योगों को बड़ा झटका लगने से बचाया जा सकता है, वरना इसका असर पूरे अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।