संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी United Nations Development Programme की नई रिपोर्ट ने भारत सहित पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए गंभीर चेतावनी जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव, तेल आपूर्ति में रुकावट, शिपिंग लागत में वृद्धि और वैश्विक व्यापार पर दबाव का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे पर पड़ सकता है। सबसे खराब स्थिति में भारत में लगभग 25 लाख लोग अतिरिक्त रूप से गरीबी रेखा के नीचे जा सकते हैं।
भारत में गरीबी दर क्यों बढ़ सकती है?
रिपोर्ट के मुताबिक भारत की गरीबी दर 23.9 प्रतिशत से बढ़कर 24.2 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इससे देश में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या लगभग 351.5 मिलियन से बढ़कर 354 मिलियन तक हो सकती है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि इसका मतलब है कि लाखों परिवारों की आय, रोजगार, भोजन और शिक्षा पर सीधा असर पड़ेगा।
तेल और गैस उद्योग पर सबसे बड़ा दबाव
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। यदि क्षेत्र में युद्ध या तनाव बढ़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है। इससे पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और सीएनजी की कीमतें बढ़ेंगी।
तेल की बढ़ती कीमतों का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन महंगा होगा, बिजली उत्पादन लागत बढ़ेगी और हर उद्योग की लागत बढ़ जाएगी। खासकर मैन्युफैक्चरिंग, सीमेंट, स्टील, केमिकल और प्लास्टिक उद्योगों को सबसे अधिक नुकसान हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में संकट के कारण एशिया-प्रशांत क्षेत्र को 97 अरब डॉलर से 299 अरब डॉलर तक का आर्थिक नुकसान हो सकता है।
परिवहन और लॉजिस्टिक्स सेक्टर पर असर
यदि Strait of Hormuz जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में व्यवधान आता है, तो भारत में शिपिंग और फ्रेट लागत तेजी से बढ़ सकती है। भारत के लिए आयात और निर्यात महंगे हो जाएंगे। कंटेनर चार्ज, बीमा प्रीमियम और जहाज संचालन की लागत बढ़ने से लॉजिस्टिक्स कंपनियों का मुनाफा घट सकता है।
ई-कॉमर्स, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मा कंपनियां, जो समय पर सप्लाई चेन पर निर्भर करती हैं, उन्हें कच्चे माल की कमी और डिलीवरी में देरी का सामना करना पड़ सकता है।
ऑटोमोबाइल और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर दबाव
भारत का ऑटो सेक्टर पहले से ही महंगे कच्चे माल और सप्लाई चेन चुनौतियों से जूझ रहा है। यदि ईंधन महंगा होता है, तो वाहन निर्माण लागत और परिवहन लागत दोनों बढ़ेंगे। इससे कार, बाइक, ट्रक और कमर्शियल वाहनों की कीमतें बढ़ सकती हैं।
इसके अलावा, टायर, बैटरी, लुब्रिकेंट, प्लास्टिक पार्ट्स और मेटल आधारित उत्पादों की लागत भी बढ़ सकती है। इससे छोटे और मध्यम उद्योगों यानी MSME सेक्टर पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
कृषि और खाद्य उद्योग पर प्रभाव
पश्चिम एशिया संकट का असर खाद्य महंगाई पर भी पड़ सकता है। ईंधन महंगा होने से ट्रैक्टर, सिंचाई, खाद, कीटनाशक और कृषि परिवहन की लागत बढ़ेगी। इसका सीधा असर फल, सब्जी, अनाज, दूध और अन्य खाद्य उत्पादों की कीमतों पर पड़ेगा।
यदि खाद्य कीमतें बढ़ती हैं, तो गरीब और निम्न मध्यम वर्ग की घरेलू आय पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ेगा। इससे कुपोषण, खाद्य असुरक्षा और ग्रामीण गरीबी बढ़ सकती है।
आईटी, टेक और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर पर असर
भारत का आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर वैश्विक सप्लाई चेन पर निर्भर है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव के कारण समुद्री मार्ग प्रभावित होते हैं, तो चिप्स, सर्वर, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और नेटवर्क उपकरणों की सप्लाई प्रभावित हो सकती है।
डेटा सेंटर कंपनियों के लिए बिजली और कूलिंग लागत बढ़ सकती है। वहीं, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए उत्पादन लागत बढ़ने की आशंका है। भारत के सेमीकंडक्टर मिशन और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन योजनाओं पर भी दबाव आ सकता है।
रेमिटेंस और खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीयों पर असर
लाखों भारतीय खाड़ी देशों में काम करते हैं और हर साल भारत में बड़ी मात्रा में रेमिटेंस भेजते हैं। यदि पश्चिम एशिया में आर्थिक गतिविधियां धीमी होती हैं या नौकरियों पर असर पड़ता है, तो भारत आने वाली रेमिटेंस में गिरावट आ सकती है।
इसका असर खासकर Kerala, Uttar Pradesh, Bihar और Tamil Nadu जैसे राज्यों पर पड़ सकता है, जहां बड़ी संख्या में लोग खाड़ी देशों में काम करते हैं।
मानव विकास सूचकांक पर भी पड़ेगा असर
रिपोर्ट के अनुसार भारत के मानव विकास सूचकांक यानी HDI में 0.03 से 0.12 वर्ष तक की प्रगति का नुकसान हो सकता है। इसका मतलब है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, आय और जीवन स्तर में सुधार की गति धीमी पड़ सकती है। Iran जैसे देशों में यह नुकसान एक से डेढ़ साल तक हो सकता है।
सरकार और उद्योगों को क्या करना चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को ऊर्जा स्रोतों में विविधता लानी होगी, तेल भंडारण क्षमता बढ़ानी होगी और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना होगा। साथ ही, छोटे उद्योगों, गरीब परिवारों और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को राहत देने के लिए लक्षित सब्सिडी, नकद सहायता और रोजगार योजनाएं जरूरी होंगी।
रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि सरकारों को व्यापक सब्सिडी देने के बजाय जरूरतमंद परिवारों को सीधी आर्थिक सहायता देनी चाहिए, ताकि महंगाई का असर कम किया जा सके।