Aeroponics Technique: खेती-किसानी अब सिर्फ खेत और मिट्टी तक सीमित नहीं रही। बदलते समय के साथ कृषि में आधुनिक तकनीकों की एंट्री हो चुकी है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक ऐसा प्रयोग हो रहा है, जो आने वाले वर्षों में आलू की खेती की तस्वीर बदल सकता है। यहां आलू जमीन में नहीं, बल्कि हवा में उगाए जा रहे हैं। यह अनोखा काम राजमाता विजया राजे सिंधिया विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग की एरोपोनिक्स लैब में किया जा रहा है। इस लैब में करीब 20 किस्मों के आलू के बीज तैयार किए जा रहे हैं, जो पूरी तरह रोग-मुक्त, शुद्ध और बेहतर क्वालिटी वाले बताए जा रहे हैं।
मिट्टी के बिना कैसे उगते हैं आलू
एरोपोनिक्स तकनीक की सबसे खास बात यही है कि इसमें पौधे मिट्टी में नहीं लगाए जाते। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस प्रक्रिया में सबसे पहले टिशू कल्चर के जरिए लैब में आलू के छोटे-छोटे पौधे तैयार किए जाते हैं। जब ये पौधे थोड़े मजबूत हो जाते हैं, तब इन्हें एरोपोनिक्स यूनिट में ट्रांसप्लांट किया जाता है। यहां पौधों की जड़ें हवा में लटकी रहती हैं। जड़ों को सीधे पोषक तत्व देने के लिए मिस्ट यानी फॉगिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है। इससे पौधों को मिट्टी के बिना ही सभी जरूरी न्यूट्रिशन मिल जाते हैं।
फॉगिंग सिस्टम और कंट्रोल्ड माहौल में ग्रोथ
एरोपोनिक्स यूनिट के अंदर पूरा माहौल कंट्रोल किया जाता है। हर तीन मिनट में करीब 30 सेकेंड के लिए फॉगिंग होती है, जिससे पौधों की जड़ों तक पोषक तत्व पहुंचते रहते हैं। तापमान और नमी को भी वैज्ञानिक तरीके से संतुलित रखा जाता है, ताकि पौधों की ग्रोथ तेज और हेल्दी हो सके। कुछ ही दिनों में जड़ों का अच्छा विकास होने लगता है और करीब 45 से 55 दिनों के भीतर हवा में ही आलू बनने लगते हैं। जब आलू तैयार हो जाते हैं, तो यूनिट को ऊपर उठाकर आसानी से फसल निकाली जा सकती है। इसी वजह से इसे “हवा में आलू उगाने की तकनीक” कहा जा रहा है।
रोग-मुक्त और शुद्ध बीजों की सबसे बड़ी ताकत
वैज्ञानिकों के मुताबिक, एरोपोनिक्स से तैयार होने वाले आलू के बीज पूरी तरह बीमारी-मुक्त होते हैं। सामान्य खेती में मिट्टी के जरिए कई तरह के कीट और रोग पौधों तक पहुंच जाते हैं, जिससे बीज की क्वालिटी पर असर पड़ता है। लेकिन इस तकनीक में मिट्टी का इस्तेमाल ही नहीं होता, इसलिए बीमारियों का खतरा काफी कम हो जाता है। इसके अलावा, बीजों की शुद्धता बनी रहती है और उनकी क्वालिटी भी बेहतर होती है। यही वजह है कि इन बीजों को प्रोसेसिंग इंडस्ट्री और बड़े किसानों के लिए काफी भरोसेमंद माना जा रहा है।
20 किस्मों पर चल रहा है प्रयोग
ग्वालियर की इस एरोपोनिक्स लैब में फिलहाल करीब 20 तरह की आलू की वैरायटी उगाई जा रही हैं। इनमें एक खास लाल रंग की किस्म भी शामिल है, जिसे पोषण के लिहाज से फायदेमंद माना जा रहा है। इसके अलावा, चिप्स और फ्रेंच फ्राइज बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली स्पेशल प्रोसेसिंग वैरायटी पर भी काम किया जा रहा है, क्योंकि फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में इनकी मांग लगातार बढ़ रही है। कुछ हल्के गुलाबी रंग की नई वैरायटी भी तैयार की जा रही हैं, जो सीधे खाने के लिए लोकप्रिय मानी जाती हैं।
किसानों तक पहुंचने में अभी लगेगा समय
हालांकि यह तकनीक काफी आधुनिक और प्रभावी है, लेकिन फिलहाल यह आम किसानों के लिए सस्ती नहीं है। एरोपोनिक्स यूनिट लगाने की लागत ज्यादा होती है और इसे संभालने के लिए तकनीकी जानकारी भी जरूरी होती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी अगले दो साल तक फील्ड लेवल पर रिसर्च की जाएगी, ताकि यह समझा जा सके कि कौन-सी वैरायटी किसानों के लिए ज्यादा फायदेमंद रहेगी। इसके बाद ही इन रोग-मुक्त बीजों को बड़े पैमाने पर किसानों तक पहुंचाने की योजना बनाई जाएगी।
आलू की खेती का भविष्य बदल सकती है यह तकनीक
एरोपोनिक्स जैसी तकनीकें आने वाले समय में आलू की खेती को ज्यादा वैज्ञानिक, सुरक्षित और लाभकारी बना सकती हैं। इससे न सिर्फ बीज की क्वालिटी सुधरेगी, बल्कि उत्पादन भी ज्यादा स्थिर और भरोसेमंद होगा। प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के लिए यह एक बड़ी राहत साबित हो सकती है, क्योंकि उन्हें एक जैसी क्वालिटी का कच्चा माल मिलेगा। अगर आने वाले वर्षों में इसकी लागत कम होती है और किसानों को ट्रेनिंग मिलती है, तो संभव है कि हवा में उगने वाले आलू भविष्य की खेती का नया मॉडल बन जाएं।