भारत का basmati rice सिर्फ एक अनाज नहीं, बल्कि देश की कृषि पहचान का अहम हिस्सा है। अपनी खास खुशबू, लंबे दानों और शानदार स्वाद के कारण बासमती को दुनियाभर में पसंद किया जाता है। ईरान, सऊदी अरब, यूएई, यूरोप और अमेरिका जैसे बाजारों में भारतीय बासमती की मजबूत पकड़ रही है। हालांकि हाल के दिनों में ईरान में राजनीतिक अस्थिरता के कारण बासमती बाजार पर दबाव देखने को मिल रहा है, लेकिन इसके बावजूद इसकी वैश्विक मांग और खासियत आज भी बरकरार है।
ईरान संकट का असर: बासमती के दाम क्यों गिरे?
ईरान लंबे समय से भारतीय बासमती चावल का बड़ा खरीदार रहा है। वहां चल रही राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता के कारण न सिर्फ कारोबार प्रभावित हुआ है, बल्कि भुगतान में भी देरी हो रही है। इसका सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ा है। बीते एक हफ्ते में कई प्रमुख बासमती किस्मों की कीमतों में करीब ₹5 प्रति किलो तक की गिरावट दर्ज की गई है। इससे किसानों और व्यापारियों दोनों की चिंता बढ़ गई है। हालांकि जानकार मानते हैं कि यह असर अस्थायी हो सकता है, क्योंकि बासमती की वैश्विक मांग लंबी अवधि में मजबूत बनी रहती है।
आखिर बासमती चावल है क्या खास?
बासमती को सामान्य धान से अलग बनाती है उसकी ‘नजाकत’। इसके दाने लंबे, पतले और पकने के बाद और भी लंबे हो जाते हैं। यही नहीं, इसकी नैचुरल खुशबू इसे बाकी चावलों से अलग पहचान देती है। यही वजह है कि बासमती को GI टैग मिला हुआ है, यानी इसे खास भौगोलिक क्षेत्रों में ही उगाया जा सकता है, जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी और उत्तराखंड के कुछ हिस्से।
बासमती की खेती
बासमती की खेती देखने में भले ही सामान्य धान जैसी लगे, लेकिन इसमें बारीक तकनीक और ज्यादा सावधानी की जरूरत होती है।
बीज का चयन: किसान आमतौर पर पूसा बासमती 1121, 1509, 1718 या नई किस्मों जैसे पूसा 1847 को प्राथमिकता देते हैं।
नर्सरी और रोपाई: जून–जुलाई में नर्सरी तैयार की जाती है। 25–30 दिन में तैयार पौधों को खेत में रोप दिया जाता है।
पानी और मौसम: बासमती को ज्यादा गहरे पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन खेत में नमी बनी रहनी चाहिए। सितंबर–अक्टूबर की ठंडी रातें और साफ मौसम इसकी खुशबू को और बेहतर बनाते हैं।
कटाई: कटाई बेहद सावधानी से की जाती है ताकि दाने टूटें नहीं। सही नमी (18–20%) पर कटाई करना बहुत जरूरी होता है।
सामान्य चावल से कैसे अलग है बासमती?
जहां सामान्य चावल पकने के बाद थोड़ा फूलता है, वहीं बासमती का दाना लंबाई में लगभग दोगुना हो जाता है। बासमती खिला-खिला और नॉन-स्टिकी रहता है, जबकि सामान्य चावल अक्सर चिपक जाता है। खुशबू और टेक्सचर के मामले में भी बासमती का कोई मुकाबला नहीं।
बासमती की खेती में कमाई का गणित
बासमती की खेती में शुरुआती लागत भले ही सामान्य धान की तुलना में थोड़ी अधिक होती है, लेकिन बाजार में मिलने वाली बेहतर कीमत इस अंतर को आसानी से संतुलित कर देती है। आमतौर पर एक एकड़ में बासमती उगाने पर बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी मिलाकर लगभग ₹25,000 से ₹30,000 तक का खर्च आता है। वहीं प्रति एकड़ औसतन 18 से 22 क्विंटल तक पैदावार हो जाती है।
बाजार में किस्म के हिसाब से बासमती चावल का भाव ₹3,500 से ₹5,000 प्रति क्विंटल तक रहता है। इस तरह सभी खर्च निकालने के बाद किसान एक सीजन में प्रति एकड़ करीब ₹40,000 से ₹60,000 तक का शुद्ध मुनाफा कमा सकता है, जो सामान्य धान की खेती की तुलना में कहीं ज्यादा आकर्षक माना जाता है।
बढ़ती मांग और नए मौके
आज ऑर्गेनिक बासमती और नई हाई-यील्ड किस्मों की मांग तेजी से बढ़ रही है। कई किसान अब सिर्फ खेती तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अपनी उपज को सीधे एक्सपोर्ट कर रहे हैं या खुद का ब्रांड बनाकर ज्यादा मुनाफा कमा रहे हैं।
किसानों के लिए जरूरी सलाह
बासमती की खेती में बेहतर गुणवत्ता और अधिक दाम पाने के लिए कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना बेहद अहम होता है। सबसे पहले कीटनाशकों का सीमित और संतुलित उपयोग करना चाहिए, क्योंकि इससे चावल की एक्सपोर्ट क्वालिटी सुधरती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग बढ़ती है। बुवाई से पहले बीजों का उपचार करना भी जरूरी है, जिससे फसल शुरुआती बीमारियों से सुरक्षित रहती है और उत्पादन पर नकारात्मक असर नहीं पड़ता। इसके अलावा कटाई का सही समय चुनना बहुत महत्वपूर्ण होता है, ताकि दाने पूरी तरह पके रहें, टूटें नहीं और उनकी खुशबू व गुणवत्ता बनी रहे।
बासमती की खेती फसल उगाने के साथ एक कला है। सही तकनीक, सही किस्म और सही बाजार की समझ के साथ यह खेती किसानों के लिए सचमुच “सोना उगलने” वाली साबित हो सकती है। मौजूदा उतार-चढ़ाव के बावजूद बासमती की खुशबू और पहचान लंबे समय तक दुनिया को आकर्षित करती रहेगी।