पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने दुनिया की सबसे अहम तेल लाइफलाइन Strait of Hormuz को लेकर चिंता बढ़ा दी है। तकनीकी रूप से यह समुद्री मार्ग अभी खुला है, लेकिन जमीन पर हालात सामान्य नहीं हैं। जहाजों की उपलब्धता, बीमा कवर और भुगतान व्यवस्थाओं में आ रही दिक्कतों ने तेल सप्लाई चेन को दबाव में डाल दिया है। कई बड़े टैंकर ऑपरेटर एहतियात के तौर पर खाड़ी क्षेत्र में अपने जहाज रोक रहे हैं, जबकि कुछ जहाजों को रेडियो संदेशों के जरिए रास्ता बंद होने की चेतावनी भी मिल रही है। आधिकारिक पुष्टि भले न हो, लेकिन बाजार में डर और अनिश्चितता का माहौल साफ दिखाई दे रहा है।
दुनिया की ऊर्जा नस पर दबाव
Strait of Hormuz वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का सबसे अहम समुद्री मार्ग है। रोजाना लगभग 20.5 मिलियन बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद इसी रास्ते से गुजरते हैं। यह मात्रा दुनिया की कुल समुद्री तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा है। वैकल्पिक पाइपलाइन मार्ग मौजूद जरूर हैं, लेकिन उनकी क्षमता करीब 6.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन ही है। यानी अगर होरमुज में बाधा आती है, तो बड़ी मात्रा में तेल खाड़ी क्षेत्र में ही अटक सकता है। यही वजह है कि वैश्विक बाजारों में तनाव बढ़ते ही तेल कीमतों में उछाल की आशंका बढ़ जाती है।
ब्रेंट कीमतों में तेज उछाल की आशंका
कमोडिटी विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हालात में ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतें 10 डॉलर प्रति बैरल तक और बढ़ सकती हैं। यह तेजी मांग में बढ़ोतरी से नहीं बल्कि सप्लाई में संभावित झटके से प्रेरित होगी। अगर संकट लंबा खिंचता है, तो बाजार में घबराहट के कारण कीमतों में और तेज उबाल आ सकता है। इसके साथ ही एलएनजी बाजार पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि दुनिया की करीब 20 प्रतिशत गैस सप्लाई कतर से आती है और उसका प्रमुख मार्ग भी यही समुद्री रास्ता है।
गैस संकट से डीजल की मांग बढ़ने का खतरा
अगर कतर से एलएनजी सप्लाई बाधित होती है, तो यूरोप और एशिया के कई बिजली संयंत्र गैस की जगह डीजल और फ्यूल ऑयल का इस्तेमाल बढ़ा सकते हैं। इससे डीजल की मांग तेजी से बढ़ेगी और उसकी कीमतें कच्चे तेल से भी तेज चढ़ सकती हैं। इसका असर वैश्विक महंगाई पर पड़ना तय है, क्योंकि परिवहन और बिजली लागत में वृद्धि सीधे उपभोक्ता कीमतों को प्रभावित करती है।
ओपेक प्लस की अतिरिक्त क्षमता पर भी सवाल
अक्सर कहा जाता है कि ओपेक प्लस देशों के पास 5–6 मिलियन बैरल प्रतिदिन अतिरिक्त उत्पादन क्षमता है, जो संकट में राहत दे सकती है। लेकिन वास्तविकता इससे अलग हो सकती है। तुरंत उत्पादन बढ़ाने की क्षमता सीमित है और उसका बड़ा हिस्सा सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात के पास है। दोनों देश खाड़ी क्षेत्र में ही स्थित हैं और होरमुज मार्ग पर निर्भर हैं। ऐसे में अगर यही मार्ग बाधित होता है, तो अतिरिक्त उत्पादन भी वैश्विक बाजार तक पहुंचाना चुनौती बन सकता है।
भारत के लिए बढ़ता ऊर्जा जोखिम
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और उसका प्रमुख स्रोत पश्चिम एशिया है। कच्चे तेल, एलपीजी और एलएनजी आयात में होरमुज मार्ग की हिस्सेदारी बहुत अधिक है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में किसी भी तनाव का सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है। वर्तमान में सरकार के अनुसार रणनीतिक भंडार, रिफाइनरियों और समुद्री स्टॉक मिलाकर देश के पास लगभग 74 दिनों की जरूरत के बराबर कच्चे तेल का भंडार है।
संकट लंबा चला तो क्या होगा
अगर होरमुज संकट लंबा खिंचता है, तो भारत को महंगे अंतरराष्ट्रीय बाजार से तेल और गैस खरीदनी पड़ सकती है। इससे आयात बिल बढ़ेगा, चालू खाते पर दबाव आएगा और महंगाई बढ़ सकती है। पेट्रोल-डीजल और गैस कीमतों में तेजी का असर परिवहन, कृषि और उद्योग लागत पर पड़ेगा, जो अंततः उपभोक्ता तक पहुंचेगा। यानी यह संकट सिर्फ ऊर्जा नहीं बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
सतह पर शांति, अंदर अस्थिरता
तेल बाजार फिलहाल ऊपर से स्थिर दिख सकता है, लेकिन अंदर अनिश्चितता गहराती जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि अतिरिक्त उत्पादन क्षमता को पूरी तरह सुरक्षित विकल्प मानना जोखिम भरा हो सकता है। होरमुज में छोटी-सी रुकावट भी वैश्विक ऊर्जा बाजार को झटका दे सकती है। होरमुज जलडमरूमध्य सिर्फ एक समुद्री मार्ग नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा प्रणाली की धुरी है। इसके आसपास बढ़ता तनाव भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए चेतावनी है। 74 दिनों का तेल भंडार फिलहाल सुरक्षा कवच जरूर है, लेकिन लंबा संकट ऊर्जा कीमतों, महंगाई और आर्थिक स्थिरता पर गंभीर असर डाल सकता है।