Hydroponic Strawberry Farming: भारत में स्ट्रॉबेरी की मांग हर साल तेजी से बढ़ रही है। फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री, आइसक्रीम, जूस, बेकरी और हेल्थ-फूड बाजार में इसकी खपत लगातार बढ़ रही है। इसी बढ़ती मांग के बीच किसान अब स्ट्रॉबेरी को पारंपरिक तरीके के बजाय आधुनिक तकनीक हाइड्रोपोनिक्स में उगाकर दोगुनी से ज्यादा कमाई कर रहे हैं। खास बात यह है कि इस तकनीक में मिट्टी की जरूरत नहीं होती और पौधे पाइप या कंटेनर में पोषक तत्वों वाले पानी पर ही बढ़ते हैं। इससे उत्पादन भी बढ़ता है और फलों की गुणवत्ता भी बेहतरीन रहती है।
क्या है हाइड्रोपोनिक तकनीक?
हाइड्रोपोनिक खेती आधुनिक कृषि का ऐसा तरीका है जिसमें मिट्टी की जगह पौधे विशेष पोषक तत्वों से बने घोल में उगाए जाते हैं। पौधों की जड़ें पाइपों में स्थापित नेट पॉट में होती हैं, जहां पानी के साथ NPK, मैग्नीशियम, कैल्शियम जैसे पोषक तत्व सीधे रूट सिस्टम तक पहुंचते हैं। यह तकनीक न केवल बिना खेत के खेती संभव बनाती है, बल्कि कम पानी में ज्यादा उत्पादन देती है और रोग संक्रमण भी काफी कम हो जाता है।
स्ट्रॉबेरी हाइड्रोपोनिक खेती – क्यों है फायदे का सौदा?
मौसम पर निर्भरता खत्म – स्ट्रॉबेरी को ठंडा मौसम पसंद है, लेकिन हाइड्रोपोनिक सिस्टम में ग्रीनहाउस या पॉलीहाउस में तापमान को 15–26°C तक आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। इसलिए अब यह फसल उत्तर भारत, दक्षिण भारत या गर्म राज्यों – हर जगह सालभर उगाई जा सकती है।
उत्पादन में 2–3 गुना उछाल – पारंपरिक खेती में 1 एकड़ से 6–8 टन उत्पादन मिलता है, जबकि हाइड्रोपोनिक्स में यह बढ़कर 10–15 टन तक पहुंच जाता है। यानी कम जगह में ज्यादा पैदावार।
पानी की खपत 90 फीसदी कम – इस तकनीक में पानी एक बंद सर्कुलेशन में चलता रहता है, जिससे पानी की बर्बादी लगभग ना के बराबर होती है। जिन धान या सब्जियों में पानी बहुत लगता है, उसके मुकाबले यह तकनीक बेहद किफायती है।
रोग और कीट कम – मिट्टी न होने के कारण फंगल और कीटों का खतरा लगभग खत्म हो जाता है। इससे उत्पादन सुरक्षित रहता है और कीटनाशकों पर खर्च कम होता है।
प्रीमियम गुणवत्ता के फल – हाइड्रोपोनिक में स्ट्रॉबेरी आकार में बड़ी, चमकदार और मीठी तैयार होती है। इस तरह की स्ट्रॉबेरी बाजार में हमेशा प्रीमियम रेट पर बिकती है।
किसान क्या-क्या चीजों से कर सकते हैं शुरुआत?
नेट पॉट — पौधे लगाने के लिए
ग्रोइंग मीडिया — कोकोपीट, वर्मीकुलाइट और परलाइट
न्यूट्रिएंट सॉल्यूशन — स्ट्रॉबेरी के लिए विशेष NPK मिश्रण
वाटर सर्कुलेशन सिस्टम — ड्रिप लाइन और पाइपिंग
टेम्परेचर कंट्रोल सिस्टम — कूलिंग/हीटिंग सेटअप
कौन-सी स्ट्रॉबेरी किस्में सबसे ज्यादा सफल?
हाइड्रोपोनिक खेती में स्ट्रॉबेरी की कुछ खास किस्में सबसे ज्यादा सफल मानी जाती हैं। इनमें विंटर डॉन, स्वीट चार्ली, कामरोज, निहारिका और चंद्रा प्रमुख हैं। ये किस्में नियंत्रित वातावरण में तेजी से बढ़ती हैं और कंटेनर या पाइप सिस्टम में भी बेहतरीन उत्पादन देती हैं। इनके पौधे मजबूत होते हैं, फल आकार में बड़े, चमकदार और स्वाद में मीठे निकलते हैं, जिस वजह से बाजार में इनकी मांग हमेशा बनी रहती है। पारंपरिक खेती की तुलना में ये किस्में हाइड्रोपोनिक सिस्टम में ज्यादा फल देती हैं और गुणवत्ता भी काफी उच्च होती है, इसलिए किसान इन्हें बड़े पैमाने पर अपनाते हैं।
उपज व तुड़ाई – कितनी और कब?
हाइड्रोपोनिक स्ट्रॉबेरी रोपाई के 60–90 दिनों में तोड़ने योग्य हो जाती है। पारंपरिक खेती में एक पौधा 200–400 ग्राम फल देता है। लेकिन हाइड्रोपोनिक्स में एक पौधा 500–600 ग्राम तक उत्पादन दे देता है। हाइड्रोपोनिक स्ट्रॉबेरी का आकार भी बड़ा होता है – 10-30 ग्राम तक। इसकी तुड़ाई आमतौर पर हर 5–7 दिन में होती है और सुबह के समय इसे तोड़ना सबसे सही होता है।
खर्च और मुनाफा
1,000 वर्ग फीट के हाइड्रोपोनिक स्ट्रॉबेरी सेटअप को शुरू करने में लगभग ₹1.5 से 2 लाख रुपये तक की लागत आती है। इस प्रणाली में हर स्ट्रॉबेरी पौधा औसतन 300 से 500 ग्राम तक उत्पादन देता है, जिससे कुल उपज काफी बढ़ जाती है। बाजार में स्ट्रॉबेरी की कीमतें मौसम के अनुसार बदलती हैं – सीजन में जहां यह ₹150 से ₹250 प्रति किलो बिकती है, वहीं ऑफ-सीजन में इसका दाम ₹250 से ₹400 प्रति किलो तक पहुंच जाता है।
इसी मूल्य अंतर और उच्च उत्पादन क्षमता के कारण 1,000 वर्ग फीट का सेटअप किसान को सालभर में लगभग ₹1.5 से 2.5 लाख रुपये तक की कमाई दे सकता है। अगर किसान पॉलीहाउस में बड़े स्तर पर हाइड्रोपोनिक सिस्टम स्थापित करें, तो उत्पादन और लाभ दोनों कई गुना बढ़ सकते हैं, जिससे यह खेती एक बेहद लाभदायक मॉडल बन जाती है।