Israel Iran war: मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच दुनिया के सबसे अहम तेल मार्ग होर्मुज स्ट्रेट को लेकर नई चिंता पैदा हो गई है। अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई में इस समुद्री रास्ते को बंद करने का दावा किया है। यही वह संकरा मार्ग है, जहां से वैश्विक स्तर पर लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस की आपूर्ति गुजरती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर यह रास्ता बाधित हुआ तो क्या भारत में पेट्रोल-डीजल और गैस के दामों में उछाल आएगा या आपूर्ति पर संकट खड़ा होगा।
फिलहाल सुरक्षित क्यों है भारत की तेल आपूर्ति?
विशेषज्ञों और सरकारी अधिकारियों का कहना है कि निकट भविष्य में भारत को तेल की कमी का खतरा नहीं है। देश के पास कच्चे तेल का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, जिससे कम से कम 10 दिनों की जरूरत आराम से पूरी की जा सकती है। इसके अलावा रिफाइनरियों और डिपो में पेट्रोल-डीजल जैसे तैयार ईंधन का भी 5 से 7 दिन या उससे अधिक का भंडार मौजूद है। इसलिए अगर होर्मुज स्ट्रेट पर अवरोध कुछ दिनों तक सीमित रहता है तो आम उपभोक्ताओं को तुरंत किसी कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा। यही कारण है कि सरकार और उद्योग दोनों फिलहाल स्थिति को नियंत्रित मान रहे हैं।
भारत की निर्भरता कितनी है इस समुद्री मार्ग पर?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है और इसमें से करीब आधा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से होकर आता है। प्रतिदिन लगभग 2.5 से 2.7 मिलियन बैरल तेल इसी मार्ग से इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत जैसे देशों से भारत पहुंचता है। इतना ही नहीं, भारत की लगभग 60 प्रतिशत एलएनजी और लगभग पूरी एलपीजी आपूर्ति भी इसी रास्ते से आती है, खासकर कतर और यूएई से। यही वजह है कि यदि यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहा तो गैस और रसोई ईंधन की आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है।
लंबी बंदी हुई तो क्या बढ़ेंगी दिक्कतें?
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ दिनों की बाधा से भारत पर असर सीमित रहेगा, लेकिन यदि स्थिति लंबी चली तो एलपीजी और एलएनजी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इन ईंधनों के लिए दीर्घकालिक अनुबंध होते हैं और स्पॉट बाजार में तुरंत विकल्प सीमित रहते हैं। इसके विपरीत कच्चे तेल के मामले में विकल्प अपेक्षाकृत ज्यादा हैं, इसलिए तेल रिफाइनिंग क्षेत्र तेजी से वैकल्पिक स्रोतों की ओर शिफ्ट हो सकता है।
रूस और अन्य देशों से आपूर्ति: भारत के विकल्प
अगर होर्मुज मार्ग पर संकट लंबा चलता है तो भारत अपनी तेल खरीद रणनीति बदल सकता है। रूस से आयात बढ़ाना सबसे बड़ा विकल्प माना जा रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद भारत पहले ही रियायती रूसी तेल का बड़ा खरीदार बन चुका है। आवश्यकता पड़ने पर रूस से अतिरिक्त आपूर्ति ली जा सकती है, हालांकि वहां से जहाज भारत पहुंचने में लगभग एक महीना लगाते हैं, जबकि मध्य-पूर्व से यह दूरी लगभग पांच दिन की है। इसके अलावा वेनेजुएला, ब्राजील और अफ्रीकी देशों से भी कच्चा तेल खरीदा जा सकता है। वैश्विक स्तर पर कुल तेल उत्पादन पर्याप्त है, इसलिए भौतिक कमी की आशंका कम मानी जा रही है। भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी है, जो आपात स्थिति में लगभग एक सप्ताह की जरूरत पूरी कर सकता है।
कीमतों में उछाल: सबसे बड़ा जोखिम
होर्मुज संकट का सबसे त्वरित असर वैश्विक तेल कीमतों पर दिखाई दे रहा है। ब्रेंट क्रूड हाल ही में सात महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया और 73 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बंद हुआ। साल की शुरुआत से इसमें करीब 16 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की जा चुकी है। बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि आपूर्ति जोखिम बढ़ता है तो कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं। तेल कीमतों के साथ-साथ समुद्री मालभाड़ा और बीमा लागत भी बढ़ सकती है, जिससे आयात महंगा होगा। इसका असर अंततः पेट्रोल-डीजल और गैस की घरेलू कीमतों पर पड़ सकता है। यानी भारत के लिए असली खतरा आपूर्ति की कमी से ज्यादा कीमतों के उतार-चढ़ाव और महंगाई दबाव का है।
सरकार की नजर और आगे का परिदृश्य
सरकार और तेल कंपनियां स्थिति पर लगातार नजर रख रही हैं और वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों की योजना तैयार कर रही हैं। फिलहाल देश में किसी तरह की घबराहट की स्थिति नहीं है और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भरोसा जताया जा रहा है। लेकिन यदि मध्य-पूर्व तनाव और बढ़ता है या होर्मुज मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है तो गैस और ईंधन की कीमतों में तेज उछाल संभव है। मौजूदा हालात में भारत तत्काल संकट से सुरक्षित दिखता है, लेकिन वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के बीच ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि दुनिया की नजर अब होर्मुज स्ट्रेट और मध्य-पूर्व की स्थिति पर टिकी हुई है।