महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले की गगनबावड़ा तहसील में कभी कटहल की अधिक पैदावार किसानों के लिए सिरदर्द बन चुकी थी। खेतों में लटकते सुनहरे फलों को कोई खरीददार नहीं मिलता था, और किसानों के पास उन्हें फेंकने के अलावा कोई चारा नहीं था। लेकिन इन्हीं बर्बाद हो रहे फलों ने दो भाइयों – तेजस और राजेश पवार की जिंदगी बदल दी। उन्होंने कटहल को एक ऐसा उत्पाद बना दिया, जो आज लाखों की कमाई करा रहा है और किसानों के चेहरे पर मुस्कान लौटा रहा है।
बर्बादी से शुरू हुआ नया विचार
पवार भाइयों का बचपन कटहल के पेड़ों के बीच बीता। हर साल गांव में कटहल की भरमार होती, लेकिन बाजार में मांग न होने से अधिकांश फल सड़ जाते। किसान इतने परेशान हो चुके थे कि वे कटहल तोड़ना ही छोड़ देते थे क्योंकि ढुलाई और बिक्री का खर्च निकलता नहीं था। ऐसे में, एक दिन उनके माता-पिता ने सुझाव दिया “अगर बाजार नहीं है, तो खुद ही कुछ नया बना लो।” इसी सोच ने जन्म दिया कटहल चिप्स और पारंपरिक मिठाई ‘फणस पोली’ को। परिवार ने शुरुआती तौर पर सिर्फ 15 किलो चिप्स बनाए और कोल्हापुर में घर-घर जाकर बेचे। लोगों को इसका स्वाद इतना पसंद आया कि मांग बढ़ती चली गई और यहीं से शुरू हुआ ‘कटहल से कारोबार’ का सफर।
इनोवेशन और हिम्मत का मेल
तेजस ने 2023 में आईटीआई की पढ़ाई पूरी की और पूरे जोश के साथ इस छोटे पारिवारिक प्रयोग को व्यावसायिक स्तर पर ले जाने का फैसला किया। उन्होंने कटहल काटने और पैकिंग के लिए बुनियादी मशीनें लगाईं और थोक विक्रेताओं से सीधा संपर्क किया। धीरे-धीरे उनकी यूनिट का विस्तार हुआ और अब वे हर सीजन में 4 हजार किलो से अधिक कच्चे कटहल को प्रोसेस करते हैं।
4 किलो कच्चे कटहल से करीब 1 किलो चिप्स तैयार होते हैं जिनकी कीमत गुणवत्ता और मार्केट डिमांड के हिसाब से 900 रुपये से 10 हजार रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है। वहीं, ‘फणस पोली’ मिठाई भी लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गई है।
किसानों को दी नई उम्मीद

पवार भाइयों ने केवल खुद का कारोबार नहीं बढ़ाया, बल्कि अपने पूरे इलाके के किसानों को भी जोड़ा। कटहल की तुड़ाई एक कठिन और महंगा काम होता है – पेड़ ऊंचे, फल भारी और चिपचिपे लेटेक्स से लथपथ। पवार भाइयों ने इस चुनौती को भी अवसर में बदला। उन्होंने प्रशिक्षित लोगों को नियुक्त किया और किसानों से 30 से 70 रुपये प्रति किलो की दर से कटहल खरीदना शुरू किया। अब आसपास के गांवों में कोई भी फल बर्बाद नहीं होता। किसानों को नियमित आय मिल रही है और क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं।
कटहल बना सुपरफूड, बाजार हुआ ग्लोबल
आज दुनिया में कटहल को वीगन और ग्लूटेन-फ्री सुपरफूड के रूप में पहचान मिल रही है। यह मीट का हेल्दी विकल्प बन चुका है। इससे बने जैकफ्रूट कबाब, बिरयानी और रेडी-टू-कुक आइटम्स की मांग भारत के साथ-साथ विदेशों में भी बढ़ रही है। चौधरी चरण सिंह राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में कटहल आधारित उत्पादों का बाजार 1,252 करोड़ रुपये का है, जो आने वाले पांच सालों में 1,580 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। इस बढ़ते बाजार में पवार भाइयों की कंपनी अब मजबूती से अपनी जगह बना चुकी है।
भविष्य की बड़ी योजना
सालाना 12 लाख रुपये की कमाई करने वाले पवार भाई अब अपने व्यवसाय को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की तैयारी में हैं। वे पूरी तरह से ऑटोमेटेड मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने की योजना बना रहे हैं और जल्द ही कटहल पापड़, लड्डू और रेडी-टू-ईट स्नैक्स जैसे नए उत्पाद लॉन्च करने जा रहे हैं। उनका लक्ष्य है स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाना और गांव के युवाओं को रोजगार से जोड़ना।
सफलता की सीख
पवार भाइयों की कहानी यह साबित करती है कि इनोवेशन हमेशा शहरों में नहीं, बल्कि खेतों से भी जन्म ले सकता है। जो चीज कभी बर्बादी लगती थी, वही अब आय और सम्मान का जरिया बन गई है। उनका सफर बताता है कि अगर सोच सकारात्मक हो और मेहनत निरंतर तो एक कटहल भी करोड़ों का बिजनेस बन सकता है।