देश की सूक्ष्म, लघु और मध्यम (एमएसएमई) दवा कंपनियां इस समय गंभीर चुनौतियों से जूझ रही हैं। अच्छे विनिर्माण प्रबंधन यानी जीएमपी (GMP) और “मानक गुणवत्ता के अनुरूप नहीं” यानी एनएसक्यू (NSQ) दवाओं को लेकर सख्त नियमों ने इन इकाइयों की चिंता बढ़ा दी है। नीति आयोग के साथ हाल में हुई एक बैठक में इन कंपनियों और संगठनों ने सरकार से आर्थिक और नीतिगत मदद की मांग की।
GMP अनुपालन में वित्तीय बोझ
बैठक में शामिल उद्योग प्रतिनिधियों ने कहा कि जीएमपी नियमों का पालन करना एमएसएमई कंपनियों के लिए आसान नहीं है, क्योंकि इसके लिए बड़ी पूंजी और तकनीकी संसाधनों की ज़रूरत होती है। खासकर जिन इकाइयों का टर्नओवर 50 करोड़ रुपये से कम है, वे इन बदलावों को अपनाने में खुद को असहाय महसूस कर रही हैं। इसलिए कंपनियों ने सरकार से आर्थिक सहायता और अनुपालन की समयसीमा को आगे बढ़ाने की मांग की है।
समयसीमा का उलझाव और न्यूनतम भागीदारी
सरकार ने पहले ही 250 करोड़ रुपये तक की टर्नओवर वाली इकाइयों को संशोधित अनुसूची ‘एम’ (Schedule M) के अनुपालन के लिए एक साल का समय दिया था। लेकिन शर्त यह थी कि कंपनियों को 30 मई तक ‘गैप एनालिसिस प्लान’ जमा करना होगा। चौंकाने वाली बात यह है कि देश की करीब 8,500 एमएसएमई फार्मा कंपनियों में से सिर्फ 1,600 ने ही यह योजना समय पर सौंपी। इससे साफ है कि अधिकतर कंपनियां अभी तक तैयार नहीं हैं।
नियामक की सख्ती और असंतोष
बैठक में भारतीय औषधि महानियंत्रक (DCGI) डॉ. राजीव सिंह रघुवंशी ने साफ कर दिया कि गुणवत्ता के मामले में कोई ढील नहीं दी जाएगी। उन्होंने फार्मा एसोसिएशनों को चेतावनी दी कि वे सिर्फ प्रतिनिधित्व करने तक सीमित न रहें, बल्कि अपने सदस्यों को जीएमपी के मानकों का पालन करवाने की ज़िम्मेदारी लें।
NSQ मामलों में सख्त कार्रवाई
एनएसक्यू दवाओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए DCGI ने अब नई गाइडलाइन लागू की है। कंपनियों को यदि नोटिस दिया जाता है, तो उन्हें सिर्फ दो हफ्तों के भीतर जवाब देना होगा। संतोषजनक जवाब न मिलने पर उनका लाइसेंस निलंबित किया जा सकता है। पुनर्बहाली भी तभी होगी जब सुधारात्मक कार्रवाई (CAPA) संतोषजनक पाई जाएगी।
शिक्षा और मानव संसाधन की कमी
बैठक में यह भी सामने आया कि फार्मेसी कॉलेजों की गुणवत्ताहीन शिक्षा के चलते फार्मा कंपनियों में प्रशिक्षित तकनीकी स्टाफ की भारी कमी है। इससे गुणवत्ता निरीक्षण और ऑडिट जैसे अहम कार्यों पर असर पड़ता है।
साझा बुनियादी ढांचा और वित्तीय सहयोग
फार्मा संगठनों ने सुझाव दिया कि सरकार एमएसएमई क्लस्टरों के लिए साझा गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाएं (Common QA Infrastructure) विकसित करे। साथ ही, स्थिरता परीक्षण जैसी तकनीकी प्रक्रियाओं के लिए कंपनियों को वित्तीय सहायता दी जाए ताकि एनएसक्यू की घटनाओं को रोका जा सके।
विशेषज्ञ की राय
एनटोड फार्मास्यूटिकल्स के सीईओ निखिल के. मसुरकर ने इस प्रयास को समयोचित बताया और कहा कि भारत भले ही वैश्विक फार्मा हब बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा हो, लेकिन गुणवत्ता के अंतरराष्ट्रीय मानकों तक पहुंचना अब भी एक बड़ी चुनौती है, खासकर छोटे और मझले उद्योगों के लिए।
सरकार का लक्ष्य यदि दवा की गुणवत्ता को वैश्विक स्तर तक लाना है, तो उसे एमएसएमई क्षेत्र के लिए सहायक कदम उठाने होंगे। सिर्फ नियामकीय सख्ती से नहीं, बल्कि सहयोग, वित्तीय सहायता और बुनियादी ढांचे के विकास से ही यह बदलाव संभव हो सकेगा।