“जब ज़िंदगी ने रोशनी छीनी, मैंने खुद सूरज जलाया।”
— भावेश चंदुभाई भाटिया, Founder, Sunrise Candles
From Darkness to Dawn
महाबलेश्वर की पहाड़ियों में एक छोटे-से कमरे से शुरू हुई कहानी आज करोड़ों रुपये के कारोबार में बदल चुकी है। भावेश भाटिया, एक ऐसे शख्स जिन्होंने अंधेरे को अपनी ताकत बना दिया — और कैंडल को सिर्फ़ एक उत्पाद नहीं, बल्कि उम्मीद का प्रतीक बना दिया।
जब डॉक्टर ने कहा “अब कभी नहीं देख पाओगे”
युवावस्था में ही भावेश ने अपनी दृष्टि खो दी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। पिता रिटायर थे, माँ नहीं रहीं, जेब में पैसे नहीं। बस एक सपना था — “अगर मैं नहीं देख सकता, तो कम से कम दूसरों की ज़िंदगी रोशन कर सकता हूँ।”
सड़क किनारे से शुरुआत
साल 1994 में, उन्होंने महाबलेश्वर की सड़कों पर मोमबत्तियाँ बेचना शुरू किया। पहला दिन — सिर्फ़ 25 रुपये की बिक्री। लोग मज़ाक उड़ाते थे — “अंधा आदमी मोमबत्तियाँ बेच रहा है?” भावेश मुस्कुराए — “क्यों नहीं? मैं अंधेरे की कीमत जानता हूँ।”
Sunrise Candles: जब अंधेरे ने जन्म दिया रोशनी को

धीरे-धीरे उनकी मेहनत ने आकार लिया। भावेश ने दिव्यांग लोगों को काम पर रखा — जो समाज की नज़रों में कमजोर थे, लेकिन उनके लिए वही सबसे मज़बूत थे। आज Sunrise Candles में 300 से ज़्यादा नेत्रहीन और दिव्यांग लोग काम करते हैं। उनके हाथों से बनने वाली कैंडल्स आज भारत के साथ-साथ अमेरिका, जर्मनी, जापान, और सिंगापुर तक पहुँच रही हैं।
सिर्फ़ कैंडल नहीं, एक मिशन
भावेश कहते हैं “हम कैंडल नहीं बनाते, हम उम्मीद गढ़ते हैं।” उनकी फैक्ट्री हर साल 25 लाख से ज़्यादा कैंडल्स बनाती है — सुगंधित, डिजाइनर, त्योहारों और होटलों के लिए कस्टम ऑर्डर। Sunrise Candles अब एक Social Enterprise बन चुका है — जो बिज़नेस के साथ इंसानियत भी बाँटता है।
सम्मान और पहचान
भावेश भाटिया को आज कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं:
National Award for Best Disabled Entrepreneur
CNN-IBN Real Heroes Award
Mann Ki Baat में प्रधानमंत्री मोदी ने भी उनका ज़िक्र किया।
TEDx Talks में भावेश अपनी कहानी से लाखों लोगों को प्रेरित कर चुके हैं।
भावेश भाटिया की कहानी भारत के “Inclusive Growth” मॉडल की जीवंत मिसाल है। जहाँ स्टार्टअप्स निवेश से चलते हैं, वहीं Sunrise Candles दिल से चलता है। यह सिर्फ़ “Make in India” नहीं — बल्कि “Made by Heart in India” है।
सीख जो हर उद्यमी को जाननी चाहिए
अगर दृष्टि खो भी जाए, तो विज़न नहीं खोना चाहिए। सफलता किसी पूँजी से नहीं, जिद से बनती है। असली ‘फर्श से अर्श’ वही है जो दूसरों को भी ऊपर उठाए।
निष्कर्ष
महाबलेश्वर के छोटे-से कमरे में शुरू हुआ ये सफर अब भारत की सबसे चमकदार “ह्यूमन स्टोरीज़” में शामिल है। भावेश भाटिया ने साबित किया कि अंधकार केवल एक स्थिति है, स्थायी सच नहीं।