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The Industrial Empire - उद्योग, व्यापार और नवाचार की दुनिया | The World of Industry, Business & Innovation > ट्रेंडिंग खबरें > ईरान पर US-Israel हमले से भारत के व्यापार पर मंडराया संकट
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ईरान पर US-Israel हमले से भारत के व्यापार पर मंडराया संकट

Last updated: 28/02/2026 4:29 PM
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Industrial Empire
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US-Israel हमले के बाद ईरान-मध्यपूर्व तनाव से भारत के व्यापार और तेल सप्लाई पर असर का प्रतीकात्मक चित्र
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पश्चिम एशिया में बढ़ता सैन्य तनाव अब भारत की अर्थव्यवस्था और विदेशी व्यापार के लिए नई चिंता बनता जा रहा है। हाल में ईरान पर अमेरिका और इजरायल (US-Israel) के हमलों और उसके बाद संभावित जवाबी कार्रवाई ने पूरे मध्य-पूर्व क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। यह वही इलाका है जो भारत के लिए ऊर्जा, रक्षा और व्यापार के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव बढ़ता है तो इसका सीधा असर भारत के आयात-निर्यात संतुलन, सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स लागत पर पड़ेगा।

भारत-मध्यपूर्व व्यापार: एक दशक में बदली तस्वीर
बीते दस वर्षों में पश्चिम एशिया के साथ भारत के व्यापारिक संबंधों में बड़ा बदलाव आया है। एक समय था जब ईरान और इजरायल मिलकर भारत के इस क्षेत्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा रखते थे, लेकिन प्रतिबंधों, भू-राजनीतिक बदलावों और नई व्यापार प्राथमिकताओं के कारण यह हिस्सेदारी तेजी से घट गई। भारत-ईरान द्विपक्षीय व्यापार जो एक दशक पहले 26 अरब डॉलर से अधिक था, वह अब घटकर लगभग 2–3 अरब डॉलर के आसपास रह गया है। इसका प्रमुख कारण अमेरिकी प्रतिबंध और बैंकिंग-शिपिंग बाधाएं रही हैं।

हालांकि इजरायल के साथ भारत का व्यापार अपेक्षाकृत स्थिर रहा है, लेकिन उसकी संरचना बदल गई है। अब इसमें रक्षा और उन्नत तकनीक उत्पादों का महत्व बढ़ गया है। यही वजह है कि मध्य-पूर्व में किसी भी बड़े सैन्य टकराव का असर भारत की रणनीतिक आपूर्ति पर पड़ सकता है।

रक्षा और तकनीकी आयात पर पड़ सकता है असर
पिछले दशक में भारत ने इजरायल से रक्षा उपकरणों और तकनीकी प्रणालियों का आयात तेजी से बढ़ाया है। आधुनिक हथियार, ड्रोन, एयरक्राफ्ट और स्पेस से जुड़े पार्ट्स जैसे क्षेत्रों में सहयोग गहरा हुआ है। यदि क्षेत्रीय तनाव लंबा खिंचता है या सप्लाई रूट बाधित होते हैं, तो इन रक्षा आयातों में देरी या लागत वृद्धि संभव है। विशेषज्ञों के अनुसार यह भारत की सुरक्षा खरीद योजनाओं और रक्षा उत्पादन श्रृंखला पर भी अप्रत्यक्ष असर डाल सकता है।

ऊर्जा और कमोडिटी सप्लाई पर खतरा
मध्य-पूर्व भारत के लिए कच्चे तेल और ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख स्रोत है। क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति बनने पर तेल परिवहन मार्गों पर जोखिम बढ़ जाता है। जहाजों की आवाजाही कम हो सकती है या बीमा लागत बढ़ सकती है। इससे कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और आयात बिल में वृद्धि की आशंका रहती है। यदि तेल महंगा होता है तो इसका असर केवल पेट्रोल-डीजल पर ही नहीं, बल्कि उर्वरक, प्लास्टिक, रसायन और परिवहन लागत जैसे कई क्षेत्रों पर पड़ता है। यानी पश्चिम एशिया में संघर्ष का प्रभाव भारत की घरेलू महंगाई तक पहुंच सकता है।

लाल सागर रूट बाधित हुआ तो बढ़ेगी ढुलाई लागत
वैश्विक व्यापार के लिहाज से लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र के समुद्री मार्ग एशिया और यूरोप को जोड़ने वाली जीवनरेखा माने जाते हैं। यदि संघर्ष के कारण इन मार्गों में व्यवधान आता है, तो जहाजों को लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ सकता है। इससे माल ढुलाई समय और लागत दोनों बढ़ेंगे। लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री फ्रेट और इंश्योरेंस लागत बढ़ने का सीधा असर भारत के निर्यात पर पड़ता है। जब निर्यात महंगा होता है तो वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कम होती है। इससे वस्त्र, इंजीनियरिंग, रसायन और कृषि उत्पाद जैसे क्षेत्रों के निर्यातकों को नुकसान हो सकता है।

भारत के निर्यात और आयात संतुलन पर दबाव
यदि मध्य-पूर्व में तनाव लंबा चलता है तो भारत को दोहरा आर्थिक दबाव झेलना पड़ सकता है। एक ओर ऊर्जा और रक्षा आयात महंगे होंगे, दूसरी ओर निर्यात लागत बढ़ने से विदेशी बाजारों में प्रतिस्पर्धा घटेगी। इससे व्यापार घाटा बढ़ सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत का पश्चिम एशिया के साथ व्यापार पहले ही भू-राजनीतिक कारणों से कमजोर हुआ है। ऐसे में नया सैन्य टकराव क्षेत्रीय स्थिरता को और प्रभावित कर सकता है। खासकर छोटे और मध्यम निर्यातकों के लिए यह बड़ा जोखिम बन सकता है, क्योंकि उनकी लागत संरचना अधिक संवेदनशील होती है।

आगे क्या देख रहा है भारत
भारत फिलहाल स्थिति पर करीबी नजर रखे हुए है। ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और वैकल्पिक सप्लाई स्रोतों की रणनीति पर जोर दिया जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने तेल आयात स्रोतों का विविधीकरण किया है, लेकिन मध्य-पूर्व की अहमियत अभी भी बनी हुई है। विशेषज्ञों का निष्कर्ष साफ है यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय सैन्य घटना नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार संतुलन को प्रभावित करने वाली घटना बन सकता है।

और यदि तनाव बढ़ता है, तो भारत के विदेशी व्यापार, आयात लागत और निर्यात प्रतिस्पर्धा पर इसका असर लंबे समय तक महसूस किया जा सकता है। पश्चिम एशिया में बढ़ता संघर्ष भारत के लिए ऊर्जा, रक्षा और व्यापार तीनों मोर्चों पर आर्थिक चुनौती बन सकता है। भारत के लिए आने वाले समय में सबसे बड़ी परीक्षा होगी सप्लाई चेन को सुरक्षित रखना और वैश्विक व्यापार प्रतिस्पर्धा बनाए रखना।

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