West Asia war impact: पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध और समुद्री मार्गों में बढ़े जोखिम का असर अब भारत के निर्यात कारोबार पर भी साफ दिखाई देने लगा है। लॉजिस्टिक्स और शिपिंग क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, इस समय करीब 40,000 से 45,000 भारतीय कंटेनर या तो समुद्री रास्तों में फंसे हुए हैं या फिर अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों पर अटके पड़े हैं। इन कंटेनरों में करीब 1 से 1.5 अरब डॉलर का निर्यात माल शामिल है। युद्ध के कारण कई शिपिंग मार्ग असुरक्षित हो गए हैं, जिससे माल की आवाजाही धीमी पड़ गई है और निर्यातकों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
समुद्री मार्ग में अटका अधिकांश माल
लॉजिस्टिक्स कंपनियों का कहना है कि फंसे हुए कंटेनरों में से लगभग 80 प्रतिशत समुद्री मार्ग में हैं। कई जहाज अपने निर्धारित बंदरगाहों तक पहुंचने में असमर्थ हैं, जबकि कुछ जहाजों को वैकल्पिक मार्गों की तलाश करनी पड़ रही है। इससे न केवल माल की डिलीवरी में देरी हो रही है, बल्कि कई मामलों में जहाजों को लंबा चक्कर लगाकर गंतव्य तक पहुंचना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई तो यह समस्या और गहराती जा सकती है।
शिपिंग कंपनियों के अतिरिक्त शुल्क से बढ़ी लागत
इस संकट के बीच शिपिंग कंपनियों ने भी अतिरिक्त शुल्क लगाना शुरू कर दिया है। युद्ध जोखिम और सुरक्षा चिंताओं के कारण कई कंपनियां आपातकालीन अधिभार और आकस्मिक शुल्क वसूल रही हैं। इससे प्रति कंटेनर लागत तीन से पांच गुना तक बढ़ गई है। व्यापार नीति विशेषज्ञों के मुताबिक निर्यातकों को अब प्रति कंटेनर 3,000 से 5,000 डॉलर तक अतिरिक्त शुल्क देना पड़ रहा है। सामान्य परिस्थितियों में जहां माल ढुलाई की लागत लगभग 800 से 1,500 डॉलर होती थी, वहीं अब यह कई गुना बढ़ चुकी है।
बासमती चावल समेत कई उत्पाद फंसे
फंसे हुए माल में कई महत्वपूर्ण निर्यात उत्पाद शामिल हैं। सूत्रों के अनुसार, इसमें करीब 4 लाख टन बासमती चावल भी शामिल है, जिसे खाड़ी और अन्य देशों में भेजा जाना था। इसके अलावा कपड़ा, खाद्य उत्पाद और अन्य कृषि वस्तुएं भी बड़ी मात्रा में अटकी हुई हैं। खासतौर पर जल्दी खराब होने वाले उत्पादों के निर्यातकों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है, क्योंकि लंबे समय तक देरी होने पर पूरा माल खराब हो सकता है।
निर्यातकों के सामने बढ़ा नुकसान का खतरा
इस संकट के कारण भारतीय निर्यातकों के मुनाफे पर सीधा असर पड़ रहा है। युद्ध जोखिम अधिभार, आकस्मिक शुल्क और पीक सीजन शुल्क जैसे कई अतिरिक्त खर्चों के कारण लागत लगातार बढ़ रही है। उद्योग जगत के विशेषज्ञों का कहना है कि अगर स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई तो कई निर्यातकों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। कुछ निर्यातक तो अपने माल को वापस भारत लाने के विकल्प पर भी विचार कर रहे हैं।
‘बैक-टू-टाउन’ विकल्प पर विचार
कई निर्यातक बैक-टू-टाउन (BTT) विकल्प के लिए आवेदन करने पर विचार कर रहे हैं। यह एक सीमा शुल्क प्रक्रिया है, जिसके तहत निर्यात के लिए भेजा गया माल वापस बंदरगाह से लेकर घरेलू बाजार में बेचा जा सकता है। हालांकि, यह विकल्प भी आसान नहीं है क्योंकि इसमें अतिरिक्त प्रक्रियाएं और खर्च शामिल होते हैं। इसके बावजूद कई कंपनियां नुकसान कम करने के लिए इस विकल्प पर विचार कर रही हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव से बढ़ी समस्या
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट की एक बड़ी वजह Strait of Hormuz के आसपास बढ़ा तनाव है। इस क्षेत्र से दुनिया के बड़े हिस्से का समुद्री व्यापार गुजरता है। जब यहां जोखिम बढ़ता है तो जहाजों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ते हैं, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ जाते हैं। इसी कारण कई अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों ने आपातकालीन अधिभार लागू कर दिया है।
बंदरगाहों पर भी बढ़ा दबाव
भारत के बंदरगाहों पर भी इस संकट का असर दिखाई देने लगा है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक देश के विभिन्न बंदरगाहों पर करीब 20,000 कंटेनर या तो फंसे हुए हैं या उन्हें खाली कराने का इंतजार किया जा रहा है। इसके अलावा लगभग 7 लाख टन तरल माल भी निकासी की प्रतीक्षा में है। जल्दी खराब होने वाला करीब 939 टन माल भी बंदरगाहों पर अटका हुआ है।
वैकल्पिक व्यवस्था की कोशिश
शिपिंग कंपनियां और लॉजिस्टिक्स ऑपरेटर माल की डिलीवरी सुनिश्चित करने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने की कोशिश कर रहे हैं। दुनिया के बड़े टर्मिनल ऑपरेटर DP World ने अपने ग्राहकों को सुझाव दिया है कि कुछ कंटेनरों को पहले अन्य बंदरगाहों पर उतारकर बाद में सड़क मार्ग से अंतिम गंतव्य तक पहुंचाया जा सकता है। इस तरह की व्यवस्था से कुछ हद तक दबाव कम किया जा सकता है, लेकिन इससे समय और लागत दोनों बढ़ते हैं।
संकट लंबा चला तो बढ़ सकती हैं माल ढुलाई दरें
समुद्री खुफिया फर्मों का मानना है कि अगर यह संकट लंबे समय तक जारी रहता है तो वैश्विक स्तर पर माल ढुलाई दरों में भारी वृद्धि हो सकती है। जहाजों को लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है, जिससे बंदरगाहों पर भीड़भाड़ बढ़ सकती है और शिपिंग क्षमता भी कम हो सकती है। इसका असर वैश्विक व्यापार पर पड़ना तय माना जा रहा है।
निर्यात क्षेत्र के लिए चुनौतीपूर्ण समय
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने भारतीय निर्यात क्षेत्र के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। हजारों कंटेनरों में फंसा अरबों डॉलर का माल, बढ़ती लॉजिस्टिक्स लागत और अनिश्चित समुद्री मार्ग—ये सभी कारक निर्यातकों के लिए चिंता का विषय बन गए हैं। यदि आने वाले दिनों में हालात सामान्य नहीं होते, तो यह संकट भारतीय व्यापार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला दोनों के लिए बड़ी समस्या बन सकता है।