नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को जल्द अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद बढ़ गई है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि वैश्विक व्यापार और दोनों देशों के आर्थिक हितों को देखते हुए इस समझौते को जल्द पूरा किया जाना चाहिए। वहीं, चीन के साथ व्यापार में बढ़ते असंतुलन और भारतीय उत्पादों को वहां बाजार तक पर्याप्त पहुंच नहीं मिलने पर उन्होंने चिंता जताई है।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर क्या बोलीं वित्त मंत्री?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 16 अक्टूबर 2026 को बैंकॉक में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक की वार्षिक बैठकों के दौरान अटलांटिक काउंसिल के एक कार्यक्रम में यह बात कही। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी है और उम्मीद है कि इसे जल्द से जल्द पूरा कर लिया जाएगा।
उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी व्यापार समझौते के पहले चरण को जल्द अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद जताई थी। इस चरण का मसौदा फिलहाल कानूनी प्रक्रिया से गुजर रहा है। हालांकि, समझौते पर अंतिम हस्ताक्षर और इसे लागू करने की प्रक्रिया अभी बाकी है।
चीन के साथ व्यापार में असंतुलन पर चिंता
सीतारमण ने चीन के साथ भारत के व्यापारिक संबंधों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चीन की ओर से लगाए जाने वाले गैर-टैरिफ अवरोध भारतीय उत्पादों के लिए बाजार तक पहुंचने में बड़ी बाधा हैं। उनके मुताबिक, इस मुद्दे पर लंबे समय से बातचीत होने के बावजूद अपेक्षित प्रगति नहीं हुई है।
वित्त मंत्री ने जेनेरिक दवाओं, कृषि उत्पादों, सब्जियों और अन्य जल्द खराब होने वाली वस्तुओं का उदाहरण देते हुए कहा कि चीन में इन उत्पादों के लिए बाजार की संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन भारतीय निर्यातकों को वहां पर्याप्त अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत व्यापार असंतुलन को दूर करने के लिए बातचीत का रास्ता अपनाने को प्राथमिकता देता है।
भारत का चीन के साथ कितना है व्यापार घाटा?
वित्त वर्ष 2025-26 में चीन के साथ भारत का वस्तु व्यापार घाटा करीब 112.1 अरब डॉलर रहा। इस दौरान भारत ने चीन को लगभग 19.5 अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि वहां से आयात करीब 131.6 अरब डॉलर का रहा। ये आंकड़े दोनों देशों के बीच व्यापार के असंतुलन को दर्शाते हैं।
भारत की चिंता यह है कि चीन से आयात का स्तर काफी अधिक है, जबकि भारतीय कंपनियों को चीनी बाजार में अपने उत्पादों की पहुंच बढ़ाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में सरकार व्यापार संबंधों में संतुलन लाने और भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर तलाशने पर जोर दे रही है।
रुपये में व्यापार भुगतान को बढ़ावा देने की तैयारी
सीतारमण ने स्थानीय मुद्राओं में व्यापार भुगतान को बढ़ावा देने की भारत की पहल का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जिन देशों को विदेशी मुद्रा की कमी का सामना करना पड़ता है, उनके साथ रुपये में भुगतान की व्यवस्था से जरूरी वस्तुओं का व्यापार जारी रखने में मदद मिल सकती है।
भारत का प्रयास है कि वैश्विक व्यापार में आने वाली बाधाओं के बीच निर्यात के लिए नए बाजार विकसित किए जाएं और आर्थिक साझेदारी को मजबूत किया जाए। वित्त मंत्री के बयान से स्पष्ट है कि सरकार अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने के साथ-साथ चीन के साथ व्यापार में मौजूद चुनौतियों का समाधान भी तलाश रही है।
आगे क्या होगा?
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का अंतिम स्वरूप दोनों देशों के बीच जारी बातचीत, बाजार तक पहुंच और व्यापारिक शर्तों पर निर्भर करेगा। समझौते को जल्द पूरा करने की उम्मीद जरूर जताई गई है, लेकिन इसकी अंतिम तारीख की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
वहीं, चीन के साथ व्यापार में संतुलन कायम करना और भारतीय उत्पादों के लिए बाजार तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करना भारत की प्रमुख आर्थिक चुनौतियों में बना हुआ है। आने वाले समय में इन दोनों मोर्चों पर होने वाली प्रगति का असर देश के निर्यात, उद्योग और वैश्विक व्यापारिक संबंधों पर पड़ सकता है।