अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोमवार, 19 अक्टूबर को कच्चे तेल की कीमतों में हल्की गिरावट दर्ज की गई। दिसंबर डिलीवरी वाला ब्रेंट क्रूड करीब 1.71 प्रतिशत फिसलकर 107.98 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था। इससे पहले 18 अक्टूबर को ब्रेंट क्रूड ने पांच महीने का उच्च स्तर छुआ था। कीमतों में आई इस नरमी से भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी तनाव और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण तेल की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
खाड़ी क्षेत्र में तनाव से तेल सप्लाई पर खतरा
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच तेल टैंकरों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। समुद्री मार्गों पर हमलों की खबरों से वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हो रहा है। खास तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निवेशकों की नजर है। यह दुनिया के प्रमुख तेल परिवहन मार्गों में शामिल है और यहां किसी भी तरह की बाधा से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।
अमेरिका ने तेल परिवहन को लेकर क्या कहा?
अमेरिका ने सप्ताहांत में दावा किया कि उसकी सेनाओं ने पिछले एक सप्ताह के दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से 10 करोड़ बैरल से अधिक तेल की आवाजाही में मदद की। इससे संकेत मिलता है कि तनाव के बावजूद इस अहम समुद्री मार्ग से तेल की आपूर्ति जारी रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, टैंकरों की सुरक्षा को लेकर बनी चिंताओं के कारण सप्लाई बाधित होने का जोखिम अभी टला नहीं है।
इस साल 75 प्रतिशत से ज्यादा महंगा हुआ ब्रेंट क्रूड
पश्चिम एशिया में संघर्ष और रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ाई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, इस साल ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 75 प्रतिशत से ज्यादा तेजी आई है। ऊंची कीमतों का असर उन देशों पर अधिक पड़ता है, जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं। भारत भी कच्चे तेल के आयात पर काफी निर्भर है।
पेट्रोल-डीजल के निर्यात शुल्क में बदलाव
भारत सरकार ने पेट्रोल और डीजल के निर्यात पर लगने वाले शुल्क में भी बदलाव किया है। सरकारी आदेश के मुताबिक, पेट्रोल निर्यात शुल्क 50 पैसे से बढ़ाकर 2.50 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। वहीं, डीजल निर्यात शुल्क 16 रुपये से घटाकर 8.50 रुपये प्रति लीटर किया गया है। नई दरें 16 अक्टूबर से लागू हुई हैं।
भारत के लिए क्यों अहम हैं तेल की कीमतें?
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से भारत के आयात बिल और महंगाई के दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है। इसके विपरीत, कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहने से रुपये, परिवहन लागत और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
फिलहाल ब्रेंट क्रूड 108 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। ऐसे में हालिया गिरावट को बड़ी राहत मानना जल्दबाजी होगी। आने वाले दिनों में तेल की कीमतों की दिशा काफी हद तक होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही, पश्चिम एशिया के हालात और रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़े घटनाक्रम पर निर्भर करेगी।