देश में दालों की बढ़ती कीमतों ने आम उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। कम बारिश के कारण घरेलू उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका और अल नीनो से जुड़े मौसमी जोखिमों के बीच भारत में दालों के आयात में तेजी आई है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 में अप्रैल से अगस्त के दौरान दालों का आयात पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 67 प्रतिशत बढ़कर 20.6 लाख टन हो गया। वहीं, आयात पर खर्च 38 प्रतिशत बढ़कर 1.18 अरब डॉलर पहुंच गया।
घरेलू बाजार में भी कई प्रमुख दालों के दाम बढ़े हैं। ऐसे में सरकार के सामने उपभोक्ताओं को महंगाई से राहत देने और किसानों के हितों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है।
अरहर, चना और उड़द के दाम बढ़े
खुदरा बाजार में अरहर, चना और उड़द की कीमतों में पिछले साल की तुलना में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के मूल्य निगरानी प्रकोष्ठ के आंकड़ों के अनुसार, अरहर की औसत कीमत 132.75 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंच गई है। चना 93.48 रुपये और उड़द 125.46 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक रही है।
पिछले वर्ष की तुलना में अरहर के दाम 15 प्रतिशत, चने के 7.5 प्रतिशत और उड़द के 10 प्रतिशत बढ़े हैं। दालें भारतीय परिवारों के रोजाना के भोजन का अहम हिस्सा हैं, इसलिए इनकी कीमतों में बढ़ोतरी का असर घरेलू बजट पर पड़ता है।
मसूर और पीली मटर की मांग बढ़ी
आयात के आंकड़े बताते हैं कि भारत में कुछ दालों की विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता बढ़ रही है। अप्रैल से अगस्त के बीच मसूर का आयात 200 प्रतिशत बढ़कर 6.40 लाख टन हो गया। वहीं, पीली मटर का आयात 114 प्रतिशत बढ़कर 6.20 लाख टन दर्ज किया गया।
इसी अवधि में अरहर का आयात 10 प्रतिशत बढ़कर 3.50 लाख टन रहा। दूसरी ओर, उड़द का आयात तीन प्रतिशत घटकर 2.70 लाख टन पर आ गया। आयात की मात्रा में तेज बढ़ोतरी के बावजूद कुल आयात मूल्य में अपेक्षाकृत कम वृद्धि से संकेत मिलता है कि इस अवधि में अंतरराष्ट्रीय बाजार में औसत आयात लागत की बढ़ोतरी सीमित रही।
मौसम और वैश्विक आपूर्ति पर नजर
दलहन बाजार के लिए आने वाले महीने अहम होंगे। रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण आपूर्ति में आने वाली बाधाएं और कनाडा से मिलने वाली मसूर व पीली मटर की कीमतों में तेजी भारत के आयात को प्रभावित कर सकती है।
घरेलू स्तर पर खरीफ सीजन में दलहन की बुवाई का रकबा 118.4 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष से 1.42 प्रतिशत अधिक है। हालांकि, महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में कम बारिश से फसलों पर असर पड़ने की आशंका है। रबी सीजन में चना और मसूर की बुवाई भी मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
आयात शुल्क घटाने की मांग
दालों की महंगाई पर नियंत्रण के लिए कारोबारी सरकार से आयात शुल्क में राहत देने की मांग कर रहे हैं। हालांकि, देश में करीब 45 लाख टन का बफर स्टॉक होने के कारण फिलहाल शुल्क में कटौती की संभावना कम बताई जा रही है।
पीली मटर पर 30 प्रतिशत और मसूर पर 10 प्रतिशत आयात शुल्क वित्त वर्ष 2026-27 के अंत तक लागू रहेगा। इससे पहले वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का दाल आयात 5.54 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा था, जो 2025-26 में घटकर 3.63 अरब डॉलर रह गया।
अब घरेलू उत्पादन, मौसम और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति तय करेगी कि आने वाले महीनों में दालों की कीमतों को राहत मिलती है या महंगाई का दबाव बना रहता है।