हर माता-पिता की ख्वाहिश होती है कि उनका बच्चा अच्छी शिक्षा पाए, बेहतर स्कूल जाए और एक शानदार करियर बनाए। जैसे ही परिवार की आमदनी थोड़ी बढ़ती है, सबसे पहला सपना होता है, बच्चे को किसी अच्छे प्राइवेट स्कूल में दाखिला दिलाना। लेकिन आज के दौर में “अच्छे स्कूल” का मतलब बन गया है – बेशकीमती फीस, ऊंचे खर्चे और खाली होती जेबें।
सीए मीनल गोयल का सच बताने वाला आंकड़ा
चार्टर्ड अकाउंटेंट मीनल गोयल ने सोशल मीडिया पर एक ऐसा कैलकुलेशन साझा किया, जो देश के मध्यमवर्गीय माता-पिता की आंखें खोल सकता है। वह साफ कहती हैं, “अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में भेजना बंद करो।” उनके मुताबिक, आज शिक्षा एक जरूरत से ज्यादा एक फाइनेंशियल बोझ बन चुकी है, जो मिडिल क्लास परिवारों को धीरे-धीरे अंदर से खोखला कर रही है।
एक बच्चे की सालाना फीस जानकर चौंक जाएंगे

मीनल बताती हैं कि किसी सामान्य प्राइवेट स्कूल की सालाना फीस का हिसाब इस तरह बनता है:
एडमिशन फीस: ₹35,000
ट्यूशन फीस: ₹1,40,000
सालाना चार्ज: ₹38,000
ट्रांसपोर्ट फीस: ₹44,000 से ₹73,000
किताबें और यूनिफॉर्म: ₹20,000 से ₹30,000
इन सब खर्चों को मिलाकर एक बच्चे पर सालाना करीब 2.5 लाख से 3.5 लाख रुपये तक का खर्च आता है। वहीं बड़े शहरों में यह खर्च 4 लाख रुपये से भी ऊपर चला जाता है। और अगर दो बच्चे हों, तो यह बोझ सीधा दोगुना हो जाता है।
आमदनी का 70-80 प्रतिशत सिर्फ स्कूल फीस में
भारत में एक व्यक्ति की औसत सालाना आय लगभग 4.4 लाख रुपये मानी जाती है। ऐसे में अगर कोई मां या पिता अकेले कमा रहा है और एक बच्चे की फीस ही 2 से 4 लाख तक पहुंच रही है, तो सोचिए बाकी खर्चों के लिए क्या बचेगा? मीनल कहती हैं, “हम हेल्थ इंफ्लेशन की बात करते हैं, लेकिन एजुकेशन इंफ्लेशन मिडिल क्लास को चुपचाप मार रहा है।”
बचत खत्म, सपने अधूरे
माता-पिता स्कूल फीस के लिए अपनी बचत में हाथ डालते हैं, जरूरी खर्चों में कटौती करते हैं और कभी-कभी लोन तक लेते हैं। घूमना-फिरना, खुद पर खर्च करना, या भविष्य के लिए निवेश करना – सब कुछ पीछे छूटने लगता है। ऐसा लगता है जैसे एक अच्छी स्कूल यूनिफॉर्म के लिए पूरी फैमिली अपनी कमाई का “त्यागव्रत” ले रही है।
क्या है समाधान?
यह सवाल अब हर मिडिल क्लास परिवार को खुद से पूछना चाहिए – क्या वाकई महंगे प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना ही अच्छी शिक्षा का पैमाना है? क्या सरकारी या सस्ते स्कूलों में बेहतर विकल्प नहीं खोजे जा सकते? शायद वक्त आ गया है कि शिक्षा की चमकदार पैकेजिंग के पीछे छुपे आर्थिक दबाव को समझा जाए और सोच-समझकर निर्णय लिया जाए।
बच्चे की शिक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन अपनी वित्तीय सेहत की कीमत पर नहीं। अगर मिडिल क्लास को अपनी आर्थिक स्थिरता बनाए रखनी है, तो उन्हें इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना होगा। शिक्षा अधिकार है, विलासिता नहीं। इसलिए अब ज़रूरत है कि हम इस ‘खामोश आर्थिक बोझ’ पर खुलकर चर्चा करने का समय आ गया है।