तेल और गैस क्षेत्र की कंपनियों को हाल ही में बढ़े हुए GST का असर झेलना पड़ रहा है। लेकिन सरकार अब उनकी बढ़ी हुई लागत की भरपाई के लिए एक खास योजना तैयार कर रही है। इसका मकसद है कंपनियों को राहत देना और उत्पादन पर पड़ रहे असर को कम करना।
GST वृद्धि से क्यों बढ़ी मुश्किलें?
GST परिषद ने 3 सितंबर को तेल और गैस क्षेत्र की अन्वेषण व उत्पादन (E&P) सेवाओं और वस्तुओं पर जीएसटी 12 फीसदी से बढ़ाकर 18 फीसदी कर दिया। हालांकि इसमें इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का प्रावधान है, लेकिन तेल और प्राकृतिक गैस खुद GST के दायरे से बाहर हैं। इस वजह से कंपनियां टैक्स का पूरा फायदा नहीं उठा पा रही हैं। नतीजा यह हुआ कि उत्पादन और खनन सेवाओं की लागत बढ़ गई है और कंपनियों का मुनाफा (Margin) कम हो गया है।
क्या होगी सरकार की नई योजना?
सूत्रों की मानें तो सरकार व्यय पक्ष की योजना (Expenditure Side Scheme) पर विचार कर रही है, ताकि कंपनियों को मुआवजा दिया जा सके। इस योजना का फोकस फंसे हुए कर (Blocked Taxes) को एड्रेस करना होगा, यानी वह टैक्स जिसका ऑफसेट कंपनियों को नहीं मिल पा रहा। यह प्रस्ताव जल्द ही वित्त मंत्रालय के पास भेजा जाएगा। संभव है कि इसे तेल कंपनियों के लिए प्रोत्साहन पैकेज के रूप में लाया जाए।
रिग्स की खरीद पर सबसे ज्यादा असर
तेल और गैस के अन्वेषण और उत्पादन में रिग्स का इस्तेमाल बेहद जरूरी है। इन्हीं की खरीद पर ज्यादा GST लगाया गया है। सरकार का मानना है कि यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से अपस्ट्रीम कंपनियों की मदद के लिए की गई है, ताकि वे आधुनिक रिग्स खरीदकर उत्पादन क्षमता बढ़ा सकें। लेकिन फिलहाल इसका उल्टा असर हुआ है। उच्च जीएसटी से लागत इतनी बढ़ गई है कि कंपनियों के लिए मुनाफे का संतुलन बिगड़ गया है।
उद्योग जगत की उम्मीदें
तेल क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि अगर सरकार की योजना जल्द लागू होती है तो कंपनियों को राहत मिलेगी। इससे न सिर्फ उनकी लागत कम होगी बल्कि उत्पादन और खोज गतिविधियों को भी गति मिलेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि तेल क्षेत्र में निवेश और स्थिरता के लिए टैक्स स्ट्रक्चर का सरल होना बेहद जरूरी है। सरकार की योजना इस दिशा में एक सकारात्मक कदम हो सकता है।
क्या है तेल रिग?
तेल रिग एक बड़ी और जटिल मशीनरी होती है, जिसका इस्तेमाल धरती की गहराई से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस निकालने के लिए किया जाता है। यह रिग ज़मीन पर भी लगाए जाते हैं और समुद्र के बीच में भी। ज़मीन पर बने रिग को तटीय रिग कहा जाता है, जबकि समुद्र में लगे रिग को अपतटीय रिग कहते हैं। अपतटीय रिग बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि ये उन तेल क्षेत्रों तक पहुंच प्रदान करते हैं जहां से ज़मीन के रास्ते पहुंचना संभव नहीं होता। इनकी मदद से समुद्र की गहराई में छिपे तेल और गैस के भंडार तक पहुँचना आसान हो जाता है।
तेल रिग स्थायी संरचनाएं नहीं होतीं। जब किसी क्षेत्र से तेल या गैस समाप्त हो जाता है, तो इन्हें दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है। यही कारण है कि इनकी बनावट ऐसी होती है कि इन्हें आसानी से हटाया और स्थानांतरित किया जा सके। हालांकि, रिग का संचालन बहुत जटिल होता है और इसके लिए विशेष उपकरणों और तकनीक की आवश्यकता होती है। खासकर अपतटीय रिग का डिज़ाइन पानी की गहराई और समुद्र तल की स्थिति को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है, ताकि वे किसी भी वातावरण में सुरक्षित और प्रभावी ढंग से काम कर सकें। इस तरह तेल रिग ऊर्जा की ज़रूरतें पूरी करने में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं।
योजना का लाभ
वैसे तो GST बढ़ोतरी ने तेल कंपनियों की लागत और चुनौतियां दोनों बढ़ा दी हैं। लेकिन सरकार की प्रस्तावित योजना से उन्हें कुछ हद तक राहत मिल सकती है। अगर यह योजना लागू होती है तो कंपनियों के मुनाफे पर असर कम होगा और देश की ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी।