भारत की प्रमुख दूरसंचार कंपनियाँ रिलायंस JIO, Airtel और Vodafone Idea ने सरकार से मांग की है कि 1,200 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम सहित पूरे 6 गीगाहर्ट्ज बैंड को केवल मोबाइल संचार के लिए नीलामी के जरिए आवंटित किया जाए। इन कंपनियों का कहना है कि इस बैंड को कम क्षमता वाले लाइसेंस-फ्री वाई-फाई उपयोग के लिए विभाजित करना भारत की 6G तैयारियों को कमजोर कर सकता है।
भारत को 6G में वैश्विक नेतृत्व का मौका
दूरसंचार कंपनियों ने कहा कि यदि सरकार पूरा 6 गीगाहर्ट्ज बैंड मोबाइल सेवाओं को देती है, तो इससे भारत को विश्वस्तरीय नेटवर्क तैयार करने, स्वदेशी तकनीक विकसित करने और 6G के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर नेतृत्व करने का अवसर मिलेगा। कंपनियों का मानना है कि यह कदम “विकसित भारत 2047” के विज़न को साकार करने की दिशा में भी बेहद अहम साबित होगा।
स्पेक्ट्रम की अवधि बढ़ाने की मांग
टेलीकॉम कंपनियों ने सरकार से यह भी अनुरोध किया है कि भविष्य की नीलामियों के साथ-साथ वर्तमान में उनके पास मौजूद स्पेक्ट्रम की वैधता अवधि को 20 वर्ष से बढ़ाकर 40 वर्ष किया जाए। उनका कहना है कि तेजी से बदलते टेक्नोलॉजी माहौल और बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश को देखते हुए यह कदम निवेशकों के लिए स्थिरता लाएगा और उद्योग के दीर्घकालिक विकास में मदद करेगा।
सरकारी सिफारिशों पर कंपनियों की आपत्ति
दरअसल, दूरसंचार विभाग (DoT) ने सिफारिश दी थी कि 6 गीगाहर्ट्ज बैंड के ऊपरी हिस्से (700 मेगाहर्ट्ज) को टेलीकॉम ऑपरेटरों को दिया जाए, जबकि 500 मेगाहर्ट्ज के निचले हिस्से को वाई-फाई सेवाओं के लिए लाइसेंस-मुक्त किया जाए। इस पर कंपनियों ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह बैंड 5G और आने वाली 6G सेवाओं के लिए मिड-बैंड की तरह काम करता है और इसे बाँटने से नेटवर्क की गुणवत्ता और कवरेज दोनों पर असर पड़ेगा।
6G सेवा के लिए 400 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम जरूरी
टेलीकॉम कंपनियों के अनुसार अगर भारत को 6G सेवा में वैश्विक नेतृत्व करना है, तो हर ऑपरेटर को कम से कम 400 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम की जरूरत होगी। लेकिन, वर्तमान प्रस्ताव के अनुसार चारों ऑपरेटरों के लिए सिर्फ 175 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम ही उपलब्ध होगा, जो भारत जैसे उच्च जनसंख्या घनत्व वाले देश के लिए पर्याप्त नहीं है।
स्पेक्ट्रम की नीलामी पर कंपनियों की शर्त
कंपनियों ने यह भी कहा कि वर्तमान में केवल 400 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम ही नीलामी के लिए उपलब्ध है, जबकि बाकी हिस्सा 2030 के बाद उपलब्ध होगा, जब सैटेलाइट ऑपरेटर अपने बैंड खाली करेंगे। इसलिए उनका सुझाव है कि नीलामी तभी की जाए जब पूरा 6 गीगाहर्ट्ज बैंड उपलब्ध हो जाए, ताकि स्पेक्ट्रम का संतुलित और दीर्घकालिक आवंटन किया जा सके।
भारतीय बाजार की जरूरतें अमेरिका से भिन्न
कुछ लोगों का तर्क है कि अमेरिका ने अपने पूरे 6 गीगाहर्ट्ज बैंड को वाई-फाई के लिए लाइसेंस-मुक्त किया है। लेकिन कंपनियों का कहना है कि भारत की स्थिति अमेरिका से पूरी तरह अलग है। रिलायंस JIO ने बताया कि भारत का जनसंख्या घनत्व प्रति वर्ग किलोमीटर 481 व्यक्ति है, जबकि चीन में यह सिर्फ 150 और अमेरिका में 40 व्यक्ति है। यानि भारत के नेटवर्क को कई गुना अधिक उपयोगकर्ताओं को सेवा देनी पड़ती है। इसलिए यहाँ मजबूत मोबाइल नेटवर्क के लिए पूरा बैंड आवश्यक है।
भारत की 6G यात्रा में अहम मोड़
टेलीकॉम कंपनियों का मानना है कि 6 गीगाहर्ट्ज बैंड पर सही नीति तय करना भारत की 6G यात्रा का निर्णायक कदम होगा। अगर यह बैंड मोबाइल संचार के लिए पूरी तरह उपलब्ध कराया गया तो भारत उन्नत नेटवर्क, बेहतर कनेक्टिविटी और डिजिटल आत्मनिर्भरता के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ सकेगा।
JIO, Airtel और VI की यह मांग सिर्फ कारोबार से जुड़ी नहीं है, बल्कि भारत को डिजिटल सुपरपावर बनाने के विज़न से जुड़ी है। सरकार का फैसला तय करेगा कि आने वाले वर्षों में भारत 6G की दौड़ में अगुआ बनेगा या तकनीकी चुनौतियों से जूझता रहेगा।