अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने एक बड़े और कड़े बिल का समर्थन कर दिया है, जिसका असर सीधे उन देशों पर पड़ेगा जो रूस के साथ व्यापार करते हैं। इस कदम को अमेरिका की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें वह यूक्रेन युद्ध को रोकने के लिए रूस की आर्थिक क्षमता कम करने की कोशिश कर रहा है। ट्रंप ने फ्लोरिडा से व्हाइट हाउस लौटने से पहले स्पष्ट किया कि वे ऐसे बिल के पक्ष में हैं, जिसके तहत रूस के साथ व्यापार करने वाले किसी भी देश पर कड़े और भारी प्रतिबंध लगाए जाएंगे। उन्होंने यहां तक कहा कि – “रिपब्लिकन एक सख्त कानून ला रहे हैं, जिसमें रूस से व्यापार करने वाले देशों पर भारी पेनल्टी लगेगी… और संभव है कि ईरान को भी इस सूची में शामिल किया जाए।”
भारत और चीन पर सबसे बड़ा असर
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट बताती है कि इस बिल के लागू होने पर ट्रंप उन देशों से आयात पर 500 फीसदी तक टैरिफ लगा सकते हैं, जो रूस के साथ व्यापार जारी रखते हैं। दुनिया में रूस के सबसे बड़े ऊर्जा खरीदारों में चीन पहले और भारत दूसरे स्थान पर है। इसलिए स्वाभाविक है कि इस बिल का सबसे बड़ा असर इन्हीं दो देशों पर पड़े।
CREA के अनुसार, अक्टूबर के महीने में भारत ने रूस से €3.1 बिलियन (₹28,000 करोड़+) की एनर्जी खरीद की। इसमें 81 प्रतिशत क्रूड ऑयल, 11 प्रतिशत कोयला और 7 प्रतिशत अन्य तेल उत्पाद शामिल थे। चीन ने इसी दौरान लगभग €5.8 बिलियन की खरीद की थी। यानी, आंकड़ों से यह साफ है कि भारत अभी भी रूस का प्रमुख ऊर्जा पार्टनर है और किसी भी तरह की अमेरिकी पेनल्टी का सीधा असर भारतीय ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।
पहले भी लगा चुका है ट्रंप प्रशासन भारी टैरिफ
यह पहली बार नहीं होगा जब ट्रंप भारत पर करों को लेकर सख्त रुख अपनाएंगे। उनके पिछले कार्यकाल में भारत से आयातित कई सामानों पर 50 फीसदी तक टैरिफ लगाया गया था, जिसमें से लगभग आधा हिस्सा रूस से तेल खरीदने के लिए पेनल्टी माना जाता है। दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन अब तक कोई नई डील नहीं बन पाई है। ऐसे में यह नया प्रस्ताव भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को फिर एक नई चुनौती दे सकता है।
क्या भारत रूस से अपनी खरीद घटा रहा है?
रिपोर्ट्स बताती हैं कि सरकारी रिफाइनरीज रूसी तेल पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर जरूर रही हैं, लेकिन निजी कंपनियों ने सितंबर में अपनी खरीद बढ़ाई है। CREA के डेटा से पता चलता है कि भारत में निजी रिफाइनर रूस से आने वाले कुल तेल का दो-तिहाई हिस्सा खरीद रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि सरकारी रिफाइनरियों ने भी अक्टूबर में अपनी खरीद दोगुनी कर दी। यानी कुल मिलाकर भारत अब भी रूस का एक बड़ा तेल ग्राहक बना हुआ है। ट्रंप ने अपने बयानों में दावा किया था कि प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें रूसी तेल खरीद कम करने का आश्वासन दिया है। लेकिन भारत सरकार ने इस दावे को खारिज करते हुए साफ कहा कि “हमारा पहला लक्ष्य भारतीय उपभोक्ताओं का हित है।”
भारत बढ़ा रहा है एनर्जी डाइवर्सिफिकेशन, अमेरिका से LPG डील इसका संकेत
तेल पर रूस निर्भरता कम करने के साथ भारत अब ऊर्जा सोर्सिंग के अन्य रास्ते भी मजबूत कर रहा है। इसका बड़ा उदाहरण है अमेरिका से LPG आयात की नई डील। केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बताया कि भारत की तीन सरकारी तेल कंपनियों IOC, BPCL और HPCL ने 2026 के लिए अमेरिका से 2.2 MTPA LPG खरीदने का कॉन्ट्रैक्ट किया है। यह भारत के कुल सालाना LPG आयात का लगभग 10 फीसदी है और यह पहला स्ट्रक्चर्ड अमेरिकी LPG कॉन्ट्रैक्ट है। पुरी ने इसे ऊर्जा डाइवर्सिफिकेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। भारत दुनिया का सबसे बड़ा और तेजी से बढ़ता LPG मार्केट है और अमेरिकी सप्लायर्स के लिए अब यह एक बड़ा अवसर बनकर उभरा है।
भारत के लिए चुनौतियाँ
ट्रंप प्रशासन का नया बिल भारत के लिए निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। रूस से तेल खरीद पर भारी टैरिफ लगना भारतीय ऊर्जा लागत बढ़ा सकता है। हालांकि भारत अमेरिका के साथ ऊर्जा संबंध मजबूत कर रहा है और LPG डील इसका संकेत है। फिर भी, भारत की स्थिति संतुलन साधने वाली होगी—एक तरफ सस्ता रूसी तेल, दूसरी तरफ अमेरिका के बढ़ते दबाव। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि नई अमेरिकी नीति एशिया के ऊर्जा समीकरण को कैसे बदलती है।