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The Industrial Empire - उद्योग, व्यापार और नवाचार की दुनिया | The World of Industry, Business & Innovation > फर्श से अर्श तक > “एक चायवाले की सोच का विस्तार: नरेंद्र मोदी की कहानी लकीरों से परे”
फर्श से अर्श तक

“एक चायवाले की सोच का विस्तार: नरेंद्र मोदी की कहानी लकीरों से परे”

Last updated: 13/07/2025 2:13 PM
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Manu Tiwari
ByManu Tiwari
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शहनवाज शम्सी, गुजरात। गुजरात के एक छोटे से रेलवे स्टेशन पर धुआं उठती केतली के पास एक किशोर खड़ा होता था। उसकी आंखों में कोई साधारण सपना नहीं था – वो जानता था कि ज़िंदगी चाय तक सीमित नहीं है। उसका नाम था – नरेंद्र दामोदरदास मोदी। आज वही नाम भारत की सबसे ऊंची कुर्सी से जुड़ा है, मगर ये कहानी केवल कुर्सी तक नहीं, उस जज़्बे तक है जिसने चाय से चलकर संसद तक की राह बनाई।

मोदी की कहानी को अक्सर “चाय से पीएम” तक का नारा देकर समझा जाता है। मगर असल में ये सफर किसी नारों से नहीं, कड़े अनुशासन, दूरदृष्टि और विरोध से लड़ने की क्षमता से भरा रहा है।

छोटे शहर वडनगर में जन्मे मोदी बचपन से ही अलग सोच रखते थे। जब बाकी बच्चे क्रिकेट खेलते, वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की शाखाओं में शामिल होते। किशोरावस्था में ही उन्होंने घर-परिवार की सीमाओं को पार कर देश को समझना शुरू किया।

राजनीति में उनका प्रवेश मात्र संयोग नहीं था। वो रणनीति के खिलाड़ी थे। गुजरात में बतौर मुख्यमंत्री उनकी नीतियां, प्रशासनिक पकड़ और कॉर्पोरेट सहयोग की शैली ने उन्हें एक “डिवेलपमेंट ब्रांड” बना दिया।

साल 2002 का गुजरात दंगा उनके करियर पर ऐसा दाग था जिसे आलोचक बार-बार उभारते रहे। लेकिन मोदी ने हर आलोचना को ऊर्जा में बदला और 2014 में वो उस देश के प्रधानमंत्री बने, जहां कभी उनका खुद का बचपन संघर्षों में बीता था।

उन्होंने 2014 के बाद भारत की छवि को एक तेज़, निर्णायक और ग्लोबल नेतृत्व देने वाले देश की ओर मोड़ा। मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, उज्ज्वला योजना, जैसे कार्यक्रमों ने उन्हें एक “एक्शन-प्रधान नेता” की पहचान दी।

उनकी आलोचना करने वालों की कमी नहीं रही। लोकतंत्र पर सवाल, प्रेस की स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक नीति – मगर मोदी का सबसे बड़ा हथियार रहा है जनता से सीधा संवाद। रेडियो हो या सोशल मीडिया, मोदी ने खुद को हर भारतीय तक पहुंचाया।

कई लोग उन्हें “चुनावी मशीन” कहते हैं, तो कई उन्हें “आदर्श प्रशासक”। मगर जो बात उन्हें भीड़ से अलग करती है, वो है उनका नया सोचने का साहस। नरेंद्र मोदी की कहानी ये बताती है कि संघर्ष अगर ज़िद में बदल जाए, तो इतिहास खुद नया रास्ता बना देता है। रेलवे प्लेटफॉर्म से प्रधानमंत्री कार्यालय तक का ये सफर सिर्फ किस्मत नहीं थी, ये था एक मिशन।

TAGGED:FarshSeArshTakFromTeaToPMgujratIndianLeadershipIndustrial EmpireNarendra ModiPM ModiSuccessStory
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