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IBC पल्स सम्मेलन: तेज़ इनसॉल्वेंसी समाधान के लिए NCLT को मज़बूत करने की मांग

Last updated: 01/02/2026 1:04 PM
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Industrial empire correspondent
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IBC Pulse Conference Lucknow 2026 highlighting need to strengthen NCLT for faster insolvency resolution in India
PHDCCI ने आयोजित किया "IBC पल्स" सम्मेलन |
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PHD चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (PHDCCI) ने लखनऊ के एक निजी होटल में “IBC पल्स” सम्मेलन का आयोजन किया, जहां इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC), 2016 के तहत उभरते रुझानों, चुनौतियों और सुधारों पर विस्तार से चर्चा हुई। सम्मेलन का केंद्रीय संदेश साफ था – देश में तेज़ और प्रभावी दिवालियापन समाधान के लिए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के ढांचे को तुरंत मज़बूत करने की ज़रूरत है। वक्ताओं ने कहा कि मजबूत ट्रिब्यूनल सिस्टम से न केवल केसों का निपटारा तेज़ होगा, बल्कि फंसी हुई पूंजी दोबारा अर्थव्यवस्था में लौट सकेगी।

बैंकिंग सुधार और क्रेडिट कल्चर पर ज़ोर
सम्मेलन के मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने लोन डिफॉल्ट के पीछे के कारणों पर रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि टिकाऊ औद्योगिक विकास के लिए भारत की क्रेडिट संस्कृति और बैंकिंग सुधारों को मजबूत करना जरूरी है। उनके मुताबिक, IBC ने एनपीए रिकवरी में अहम भूमिका निभाई है और उत्तर प्रदेश में हाल के वर्षों में निवेश माहौल और क्रेडिट कल्चर में सुधार देखने को मिला है। यह संकेत देता है कि सही नीतियों और संस्थागत मजबूती से उद्योगों को नई गति दी जा सकती है।

IBC की भूमिका: फंसी पूंजी को सिस्टम में वापसी
DRAT इलाहाबाद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति राजेश दयाल खरे ने कहा कि IBC ने संकटग्रस्त परिसंपत्तियों के समाधान में परिवर्तनकारी भूमिका निभाई है। इसके जरिए बैंकों और वित्तीय संस्थानों की फंसी पूंजी वित्तीय प्रणाली में वापस लौट रही है, जिससे नई परियोजनाओं और रोजगार सृजन को बढ़ावा मिल रहा है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि समयबद्ध समाधान ही IBC की आत्मा है, और इसके लिए संस्थागत क्षमता बढ़ाना अनिवार्य है।

घटते NPA और IBC की प्रभावशीलता
PHDCCI की NCLT और IBC समिति के अध्यक्ष जी.पी. मदान ने अपने स्वागत भाषण में बताया कि इनसॉल्वेंसी समाधान और IBC आज भारत के कॉर्पोरेट इकोसिस्टम के मजबूत स्तंभ बन चुके हैं। उन्होंने आंकड़ों के साथ बताया कि सकल एनपीए घटकर करीब 2.2% और शुद्ध एनपीए 0.5% के आसपास आ गए हैं। उनका संदेश स्पष्ट था – “IBC का सबसे अच्छा उपयोग इसका उपयोग न करना है,” यानी समय पर भुगतान और जिम्मेदार उधारी से दिवालियापन की नौबत ही न आए। उन्होंने भविष्य में जागरूकता बढ़ाने के लिए ऐसे और कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा की।

NCLT की क्षमता बढ़ाने की जरूरत
वरिष्ठ अधिवक्ता और NCLT बार एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. यू.के. चौधरी ने लंबित मामलों को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि केसों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन बेंचों और सदस्यों की संख्या उतनी नहीं बढ़ी। तेज़ न्याय के लिए NCLT के बुनियादी ढांचे को अपग्रेड करना और मानव संसाधन बढ़ाना बेहद जरूरी है। इससे उद्योगों को समय पर राहत मिलेगी और निवेशकों का भरोसा मजबूत होगा।

IBC में बदलाव और नई चुनौतियां
NCLT के माननीय सदस्य (न्यायिक) प्रवीण गुप्ता ने बताया कि IBC समय के साथ विकसित हुआ है। देनदार-के-कब्ज़े से लेनदार-के-नियंत्रण की व्यवस्था ने प्रक्रिया को अधिक अनुशासित बनाया है। साथ ही, सीमा पार इनसॉल्वेंसी जैसे नए विषयों की प्रासंगिकता बढ़ रही है, जिनके लिए स्पष्ट नियम और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी होगा।

बैंकिंग सुधार, MSME और ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस
डॉ. राम मनोहर लोहिया नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. अमर पाल सिंह ने कहा कि बैंकिंग सुधार विकसित होते IBC सिस्टम का अहम हिस्सा हैं। उन्होंने ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस उपायों को जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर दिया। MSME सेक्टर की भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया कि एक मजबूत दिवालियापन ढांचा छोटे उद्यमियों को जोखिम लेने और नए प्रयोग करने का आत्मविश्वास देता है।

टेक्निकल सेशंस: प्रैक्टिकल चुनौतियों पर चर्चा
सम्मेलन के टेक्निकल सेशंस में CIRP में न्यायिक बदलाव, पर्सनल गारंटर की दिवालियापन प्रक्रिया और IBC के तहत लिक्विडेशन की प्रथाओं पर गहन चर्चा हुई। अनुभवी पेशेवरों, अधिवक्ताओं और उद्योग प्रतिनिधियों ने केस स्टडीज़ के जरिए बताया कि कैसे प्रक्रियाओं को और पारदर्शी व समयबद्ध बनाया जा सकता है। इन चर्चाओं से यह साफ़ हुआ कि नीति सुधार के साथ-साथ ग्राउंड लेवल पर क्षमता निर्माण भी जरूरी है।

राष्ट्रीय स्तर की भागीदारी और आगे की राह
देशभर से 150 से अधिक प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने दिखाया कि IBC सुधारों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर गहरी रुचि है। सम्मेलन का निष्कर्ष यही रहा कि NCLT को मजबूत करना, प्रक्रियाओं को सरल बनाना और बैंकिंग सुधारों के साथ तालमेल बढ़ाना समय की मांग है। इससे न सिर्फ निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि भारत का कॉर्पोरेट और वित्तीय इकोसिस्टम भी ज्यादा मजबूत और भरोसेमंद बनेगा।

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