फरवरी अंक उस भारत की कहानी कहता है, जो परंपरा और परिवर्तन के बीच एक नई पहचान गढ़ रहा है। इस अंक में उन खुशबुओं, स्वादों, तकनीकों और नीतिगत बदलावों का समावेश है, जो दिखने में अलग-अलग लगते हैं, लेकिन मिलकर भारत की बदलती आर्थिक और सामाजिक तस्वीर को पूरा करते हैं। हाथरस की 150 साल पुरानी हींग परंपरा से लेकर पश्चिम बंगाल के मलमल की बुनी हुई हवा तक, यह अंक बताता है कि विरासत सिर्फ अतीत नहीं होती, बल्कि भविष्य की मजबूत नींव भी बन सकती है।
कैसे लोकल कहानियां ग्लोबल अवसरों में बदल रही हैं। ठेकुआ जैसे पारंपरिक स्वाद का स्टार्टअप बनना हो, मातृभाषा और रसोई से करोड़ों का ब्रांड खड़ा होना हो या लखनऊ की चिकनकारी का लोकल से ग्लोबल सफर – ये सभी उदाहरण बताते हैं कि भारतीय पहचान अब बाजार की भाषा बोलने लगी है। वहीं पहाड़ी नमक, काला नमक चावल और देसी ब्रेकफास्ट की वापसी यह संकेत देती है कि उपभोक्ता फिर से भारतीय परंपरा जड़ों की ओर लौट रहा है।
इस अंक में खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धड़कन भी साफ सुनाई देती है। सरसों की फसल पर बढ़ते खतरे, गन्ने से ग्रीन एनर्जी तक का सफर, दलहन की पोषण और पर्यावरण में भूमिका और मत्स्य पालन से उभरती नीली अर्थव्यवस्था ये सभी भविष्य की रणनीति का हिस्सा हैं। तकनीक और नीति के मोर्चे पर भी फरवरी अंक सवाल उठाता है और रास्ते दिखाता है। स्मार्टफोन सिक्योरिटी, क्विक कॉमर्स की रफ्तार पर सरकारी दखल, V2V तकनीक से सड़क सुरक्षा का नया अध्याय और बिटकॉइन-क्रिप्टो जैसी डिजिटल क्रांति विकास का नया अध्याय लिख रहे हैं पर विकास के साथ नियंत्रण और भरोसा भी जरूरी है।
भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते और बैंक कर्ज की असमान पहुंच जैसे मुद्दे आर्थिक बहस को गहराई देते हैं। फरवरी अंक उस भारत की झलक है जो अपनी परंपराओं को संजोते हुए नए विचारों, नई तकनीक और नए बाजारों के साथ आगे बढ़ रहा है। यही भारत की असली ताकत है।
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