भारत में यात्री वाहनों के उत्सर्जन मानकों को और सख्त करने की तैयारी तेज हो गई है। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई) कॉरपोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी यानी Cafe-3 मानकों के तहत मिलने वाली ‘तकनीकी छूट’ की सूची में बड़े बदलाव करने जा रहा है। इसका मकसद साफ है – कार कंपनियों को ऐसी तकनीकों पर ही छूट का फायदा मिले, जो वाकई में ईंधन बचाने और उत्सर्जन घटाने में नई भूमिका निभाती हों।
क्यों जरूरी हुआ बदलाव?
पिछले कुछ सालों में भारतीय यात्री वाहन बाजार में कई ईंधन बचाने वाली तकनीकें आम हो चुकी हैं। अधिकारियों के मुताबिक, करीब 54 फीसदी कारों में आइडल स्टार्ट-स्टॉप सिस्टम मौजूद है, 47 फीसदी में रीजेनरेटिव ब्रेकिंग, 63 फीसदी में टायर प्रेशर मॉनिटरिंग सिस्टम और लगभग 59 फीसदी कारों में 6-स्पीड या उससे अधिक गियरबॉक्स मिल रहा है। जब ये फीचर पहले ही बड़े पैमाने पर अपनाए जा चुके हैं, तो इन्हें “तकनीकी छूट” की श्रेणी में रखना अब तर्कसंगत नहीं माना जा रहा। इसी वजह से प्रस्तावित कैफे-3 मानकों में इन पर छूट देने का विचार खत्म किया जा रहा है।
Cafe-3 क्या है और कब लागू होगा?
कैफे मानकों के तहत कार कंपनियों को साल भर में बिके अपने सभी वाहनों के औसत कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को तय सीमा के भीतर रखना होता है। यह उत्सर्जन ग्राम प्रति किलोमीटर में मापा जाता है। कैफे-3 मानक फिलहाल विमर्श के दौर में हैं और इन्हें जल्द अधिसूचित किया जा सकता है। प्रस्ताव है कि ये नियम वित्त वर्ष 2027-28 से 2031-32 तक लागू रहेंगे। नए मानकों का उद्देश्य वाहन निर्माताओं को ज्यादा कुशल और पर्यावरण के अनुकूल तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित करना है।
तकनीकी छूट की सीमा भी घटेगी
बीईई सिर्फ तकनीकों की सूची ही नहीं बदल रहा, बल्कि कंपनियों को मिलने वाले अधिकतम लाभ को भी सीमित करने की तैयारी है। सितंबर 2025 में जारी मसौदे में 9 ग्राम प्रति किलोमीटर तक की तकनीकी छूट का प्रस्ताव था। अब अंतिम अधिसूचना में इसे घटाकर 6 ग्राम प्रति किलोमीटर करने पर विचार हो रहा है। साथ ही, हर मान्यता प्राप्त तकनीक पर अधिकतम 1 ग्राम प्रति किलोमीटर तक ही छूट मिलने की संभावना है। अधिकारियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी तकनीकी छूट की सीमा लगभग इसी स्तर पर रखी जाती है। इसके अलावा, भारत में अभी हर तकनीक से होने वाली उत्सर्जन कटौती को स्वतंत्र रूप से जांचने और प्रमाणित करने की कोई एकरूप सरकारी परीक्षण प्रणाली उपलब्ध नहीं है। इसलिए कम सीमा तय कर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि छूट का लाभ सिर्फ उन तकनीकों को मिले, जो वाकई में प्रभावी और नई हों।
किन नई तकनीकों को मिल सकता है फायदा
कैफे-3 के तहत करीब 17 तकनीकों को तकनीकी छूट की सूची में शामिल किए जाने की संभावना है। ये सभी तकनीकें पहले से अमेरिका, यूरोपीय संघ, चीन और जापान जैसे बड़े बाजारों में मान्यता प्राप्त हैं। इस सूची में 12 वोल्ट का एडवांस्ड अल्टरनेटर शामिल हो सकता है, जो बैटरी को बेहतर तरीके से चार्ज करता है और इंजन पर बोझ कम करता है। इसी तरह इंटीग्रेटेड स्टार्टर जेनरेटर या बेल्ट स्टार्टर जेनरेटर सिस्टम को भी जगह मिल सकती है, जो शहरों में रुक-रुक कर चलने वाली ड्राइविंग के दौरान ईंधन बचाने में मदद करता है।
लाइटिंग और थर्मल मैनेजमेंट पर जोर
ऊर्जा बचत के लिए फुल-व्हीकल एलईडी लाइटिंग को भी तकनीकी छूट की श्रेणी में लाने पर विचार किया जा रहा है, क्योंकि यह पारंपरिक बल्बों की तुलना में कम बिजली खपत करती है। इसके अलावा सोलर-रिफ्लेक्टिव पेंट और एडवांस्ड ग्लेजिंग जैसे खास कांच भी सूची में आ सकते हैं। ये तकनीकें वाहन के केबिन में गर्मी कम करती हैं, जिससे एयर कंडीशनिंग पर दबाव घटता है और ईंधन की बचत होती है।
इंजन और कूलिंग सिस्टम में सुधार
इंजन और कूलिंग से जुड़ी उन्नत तकनीकों को भी प्राथमिकता दी जा रही है। इलेक्ट्रिक वाटर पंप, हाई-एफिशिएंसी कूलिंग फैन और इलेक्ट्रॉनिक तरीके से नियंत्रित रेडिएटर फैन जैसी प्रणालियां इंजन को बेहतर ढंग से ठंडा रखती हैं। इससे इंजन की दक्षता बढ़ती है और ईंधन की खपत में कमी आती है। बीईई का मानना है कि ऐसी तकनीकों को बढ़ावा देकर वाहन उद्योग को अगली पीढ़ी की ऊर्जा-कुशल तकनीक अपनाने की दिशा में आगे बढ़ाया जा सकता है।
ऑटो इंडस्ट्री पर क्या होगा असर
कैफे-3 मानकों में बदलाव से वाहन निर्माताओं पर दबाव बढ़ेगा कि वे सिर्फ पुराने और आम फीचर्स पर निर्भर न रहें। कंपनियों को रिसर्च और डेवलपमेंट में निवेश बढ़ाना होगा ताकि वे वाकई नई और प्रभावी तकनीकों को अपने मॉडलों में शामिल कर सकें। इससे बाजार में ज्यादा ईंधन-कुशल, कम उत्सर्जन वाले और पर्यावरण के अनुकूल वाहन आने की उम्मीद है। कैफे-3 मानकों के जरिए सरकार और बीईई यह संदेश दे रहे हैं कि तकनीकी छूट अब आसान रास्ता नहीं होगी। फायदा उसी को मिलेगा जो वास्तव में नई तकनीक अपनाकर ईंधन बचत और उत्सर्जन में ठोस कमी दिखा सके।