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The Industrial Empire - उद्योग, व्यापार और नवाचार की दुनिया | The World of Industry, Business & Innovation > ट्रेंडिंग खबरें > पश्चिम एशिया तनाव का असर: एयर टर्बाइन फ्यूल (ATF) महंगा, हवाई सफर पर बढ़ा खर्च
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पश्चिम एशिया तनाव का असर: एयर टर्बाइन फ्यूल (ATF) महंगा, हवाई सफर पर बढ़ा खर्च

Last updated: 14/03/2026 11:18 AM
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Industrial Empire
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भारत में ATF महंगा होने से एयरलाइनों की लागत बढ़ी और हवाई किराए में बढ़ोतरी, जेट फ्यूल की बढ़ती कीमतों का विमानन उद्योग पर असर
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पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब भारत के विमानन क्षेत्र पर भी साफ दिखाई देने लगा है। Iran पर United States और Israel के सैन्य हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ी है। इसका सीधा प्रभाव विमानन ईंधन यानी एयर टर्बाइन फ्यूल (ATF) की कीमतों पर पड़ा है। उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि 28 फरवरी के बाद भारत में ATF की कीमतें कच्चे तेल की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ी हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस तेजी का मुख्य कारण रिफाइनरियों का बढ़ता मार्जिन है। यानी कच्चे तेल को जेट फ्यूल में बदलने की वास्तविक लागत में बड़ा बदलाव नहीं आया, लेकिन रिफाइनरियां इससे मिलने वाला लाभ पहले की तुलना में अधिक कमा रही हैं। यही वजह है कि एयरलाइनों को पहले से कहीं अधिक कीमत पर जेट फ्यूल खरीदना पड़ रहा है।

एयरलाइनों की लागत पर बड़ा दबाव
भारत में किसी भी एयरलाइन के कुल परिचालन खर्च का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा केवल ईंधन पर खर्च होता है। ऐसे में जब ATF की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो एयरलाइनों की लागत भी सीधे बढ़ जाती है। हाल के हफ्तों में यही स्थिति देखने को मिली है। जेट फ्यूल महंगा होने के कारण कई एयरलाइनों ने टिकट की कीमतों में बढ़ोतरी की है। इसके अलावा कुछ कंपनियों ने यात्रियों से अतिरिक्त “फ्यूल सरचार्ज” भी लेना शुरू कर दिया है। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में हवाई यात्रा और महंगी हो सकती है।

विमानन क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि अगर ATF की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहती हैं, तो एयरलाइनों के लिए टिकट सस्ते रखना मुश्किल हो जाएगा। इससे यात्रियों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।

मोपैग बेंचमार्क क्या है और क्यों उठ रही है बदलाव की मांग
एयरलाइन अधिकारियों का मानना है कि भारत में ATF की कीमत तय करने का मौजूदा तरीका भी इस समस्या की एक बड़ी वजह है। फिलहाल भारतीय एयरलाइनों को जेट फ्यूल की कीमत “मीन ऑफ प्लैट्स अरब गल्फ” यानी मोपैग (MOPAG) बेंचमार्क के आधार पर चुकानी पड़ती है। यह बेंचमार्क S&P Global की कमोडिटी प्राइसिंग सेवा प्लैट्स द्वारा तय किया जाता है। इसमें खाड़ी क्षेत्र की प्रमुख रिफाइनरियों में स्पॉट जेट फ्यूल कार्गो की औसत कीमत को आधार बनाया जाता है।

मोपैग में जिन रिफाइनरियों की कीमतें शामिल होती हैं, उनमें Jubail, Ras Tanura, Ruwais, Mina Al‑Ahmadi और Sitra जैसे खाड़ी के बड़े ऊर्जा केंद्र शामिल हैं। समस्या यह है कि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद इनमें से कई रिफाइनरियों ने या तो उत्पादन कम कर दिया है या अस्थायी रूप से संचालन घटा दिया है। चूंकि यह क्षेत्र वैश्विक जेट फ्यूल निर्यात का बड़ा केंद्र है, इसलिए वहां की आपूर्ति प्रभावित होने से मोपैग बेंचमार्क पर आधारित कीमतों में तेजी आ गई।

भारत की घरेलू रिफाइनरियां क्या कर रही हैं
दिलचस्प बात यह है कि भारत में एयरलाइन कंपनियां अपना अधिकतर जेट फ्यूल घरेलू रिफाइनरियों से खरीदती हैं। इसमें Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum जैसी प्रमुख सरकारी कंपनियां शामिल हैं। ये कंपनियां भारत के भीतर ही कच्चे तेल को रिफाइन करके ATF तैयार करती हैं। एयरलाइन अधिकारियों के अनुसार, कच्चे तेल को जेट फ्यूल में बदलने की वास्तविक लागत में हाल के समय में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। इसके बावजूद ATF की कीमतें काफी तेजी से बढ़ रही हैं, जिससे एयरलाइनों को अधिक भुगतान करना पड़ रहा है।

आंकड़े क्या बताते हैं
उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार हाल तक कच्चे तेल और जेट फ्यूल की कीमतों में ज्यादा अंतर नहीं था। वित्त वर्ष 2026 में अप्रैल से फरवरी के बीच Brent Crude Oil और उससे जुड़े प्लैट्स प्रीमियम का औसत लगभग 69.5 डॉलर प्रति बैरल रहा। इसी अवधि में मोपैग आधारित ATF बेंचमार्क का औसत लगभग 84.5 डॉलर प्रति बैरल रहा, यानी दोनों के बीच लगभग 15 डॉलर प्रति बैरल का रिफाइनरी मार्जिन था। लेकिन मार्च की शुरुआत में स्थिति तेजी से बदली। Iran पर हुए सैन्य हमलों के कुछ ही दिनों बाद कच्चे तेल और ATF की कीमतों के बीच अंतर और अधिक बढ़ने लगा। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि भू-राजनीतिक तनाव ने जेट फ्यूल बाजार को असामान्य रूप से प्रभावित किया है।

समाधान क्या हो सकता है
विमानन उद्योग का मानना है कि भारत को ATF की कीमत तय करने के मौजूदा मोपैग मॉडल पर फिर से विचार करना चाहिए। इसके बजाय “कच्चे तेल की कीमत + निश्चित रिफाइनिंग मार्जिन” वाला घरेलू मॉडल अपनाया जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ऐसा किया जाता है तो ATF की कीमतें अधिक स्थिर हो सकती हैं और एयरलाइनों पर अचानक पड़ने वाला लागत का दबाव कम हो सकता है।

फिलहाल पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता के बीच यह साफ है कि जेट फ्यूल की कीमतें आने वाले समय में भी विमानन उद्योग और यात्रियों दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी रह सकती हैं।

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