डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और पारंपरिक मीडिया के बीच संघर्ष अब केवल कंटेंट और ऑडियंस तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह आर्थिक मॉडल और पत्रकारिता के भविष्य से भी जुड़ चुका है। इसी बीच ऑस्ट्रेलिया सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए Meta Platforms, Google और TikTok जैसी बड़ी डिजिटल कंपनियों पर 2.25% टैक्स लगाने का प्रस्ताव रखा है। सरकार का कहना है कि इन प्लेटफॉर्म्स ने सालों से समाचार संस्थानों के कंटेंट से ट्रैफिक और विज्ञापन का फायदा उठाया है, लेकिन पत्रकारिता को उसका उचित आर्थिक लाभ नहीं मिला।
ऑस्ट्रेलिया के इस फैसले ने एक बार फिर टेक कंपनियों और मीडिया इंडस्ट्री के बीच बहस को तेज कर दिया है। यह कदम केवल टैक्स लगाने का मामला नहीं है, बल्कि यह इस बड़े सवाल से जुड़ा है कि डिजिटल युग में पत्रकारिता को आर्थिक रूप से टिकाऊ कैसे बनाया जाए।
क्या है ऑस्ट्रेलिया का नया प्रस्ताव?
ऑस्ट्रेलिया सरकार ने मंगलवार को एक ड्राफ्ट कानून जारी किया है, जिसे 2 जुलाई तक संसद में पेश किए जाने की योजना है। इस प्रस्ताव के तहत अगर बड़ी डिजिटल कंपनियां स्थानीय समाचार संस्थानों के साथ व्यावसायिक समझौते नहीं करतीं, तो उन पर ऑस्ट्रेलिया में होने वाली उनकी कुल आय का 2.25% टैक्स लगाया जाएगा।
सरकार ने इस नए ढांचे को “समाचार सौदेबाजी प्रोत्साहन” (News Bargaining Incentive) नाम दिया है। इसका मकसद कंपनियों को यह संकेत देना है कि अगर वे पत्रकारिता को आर्थिक सहयोग देंगी, तो उन्हें टैक्स में छूट मिल सकती है। लेकिन अगर वे भुगतान से बचती हैं, तो उन्हें आर्थिक दंड झेलना पड़ेगा। यह मॉडल सरकार के लिए दोहरा फायदा देने वाला है—एक ओर मीडिया संस्थानों को समर्थन मिलेगा और दूसरी ओर डिजिटल कंपनियों पर जिम्मेदारी बढ़ेगी।
सरकार क्यों मानती है यह जरूरी?
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री Anthony Albanese ने इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि पत्रकारों के काम की आर्थिक कीमत तय करना जरूरी है। उनके अनुसार, बड़ी टेक कंपनियां पत्रकारों द्वारा तैयार किए गए कंटेंट का इस्तेमाल कर विज्ञापन से कमाई करती हैं, लेकिन बदले में पत्रकारिता को उसका उचित हिस्सा नहीं मिलता।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि मजबूत पत्रकारिता किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ होती है। अगर न्यूज संस्थानों की आय कमजोर होती जाएगी, तो इससे सूचना की गुणवत्ता और लोकतांत्रिक जवाबदेही दोनों प्रभावित हो सकती हैं। सरकार का मानना है कि डिजिटल विज्ञापन बाजार में आए बड़े बदलावों ने पारंपरिक मीडिया के बिजनेस मॉडल को कमजोर किया है। ऐसे में टेक कंपनियों को इस इकोसिस्टम में योगदान देना चाहिए।
यह ऑस्ट्रेलिया का पहला प्रयास नहीं
ऑस्ट्रेलिया इससे पहले भी 2021 में एक बड़ा कदम उठा चुका है, जब उसने News Media Bargaining Code लागू किया था। उस समय सरकार ने बड़ी डिजिटल कंपनियों को मजबूर किया था कि वे समाचार संस्थानों के साथ कंटेंट के बदले भुगतान संबंधी समझौते करें। शुरुआत में Meta Platforms और Google जैसी कंपनियों ने कई मीडिया हाउस के साथ डील की थी, ताकि सरकार द्वारा नियुक्त मध्यस्थ कीमत तय न करे।
हालांकि, बाद में कई कंपनियों ने उन समझौतों को रिन्यू करने से बचने के लिए अपने प्लेटफॉर्म्स पर न्यूज कंटेंट की उपलब्धता कम कर दी। इससे सरकार को लगा कि पुराने कानून में loopholes मौजूद हैं, जिनका कंपनियां फायदा उठा रही हैं। अब नया प्रस्ताव इन्हीं कमियों को दूर करने की कोशिश है।
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कितना पैसा जुटा सकती है सरकार?
ऑस्ट्रेलिया सरकार का अनुमान है कि इस नए टैक्स मॉडल से हर साल 200 से 250 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर जुटाए जा सकते हैं। यह रकम लगभग उसी स्तर की है, जितना भुगतान कंपनियों ने 2021 के बाद अपने चरम समय में समाचार संस्थानों को किया था। संचार मंत्री अनिका वेल्स के अनुसार, यह राशि मीडिया संस्थानों के बीच वहां काम करने वाले पत्रकारों की संख्या के आधार पर वितरित की जाएगी। इस मॉडल से छोटे और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों को भी आर्थिक सहयोग मिलने की उम्मीद है, जो डिजिटल प्रतिस्पर्धा के दौर में सबसे ज्यादा दबाव झेल रहे हैं।
Meta ने क्यों कहा ‘जबरन संपत्ति हस्तांतरण’?
Meta Platforms ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है। कंपनी का कहना है कि समाचार संस्थान अपनी इच्छा से Facebook और Instagram जैसे प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट शेयर करते हैं, क्योंकि इससे उन्हें ऑडियंस और ट्रैफिक मिलता है। Meta ने बयान जारी कर कहा कि यह कहना गलत है कि प्लेटफॉर्म्स समाचार कंटेंट “ले” लेते हैं। कंपनी के अनुसार, यह प्रस्ताव वास्तव में एक तरह का डिजिटल सर्विस टैक्स है, जो विज्ञापन उद्योग में हो रहे बदलावों को समझने में विफल है। Meta ने इसे “जबरन संपत्ति हस्तांतरण” जैसा बताया और कहा कि इससे न्यूज इंडस्ट्री सरकारी सब्सिडी पर निर्भर हो सकती है।
Google की क्या आपत्ति है?
Google ने भी इस प्रस्ताव को अनावश्यक बताया है। कंपनी का कहना है कि वह पहले से कई समाचार संस्थानों के साथ कमर्शियल समझौते कर चुकी है।
Google की सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि यह नीति केवल चुनिंदा कंपनियों को निशाना बना रही है। कंपनी ने कहा कि Microsoft, Snap Inc. और OpenAI जैसे प्लेटफॉर्म्स को इस दायरे से बाहर रखा गया है, जबकि वे भी लोगों के समाचार देखने और उपभोग करने के तरीके को प्रभावित कर रहे हैं। Google का तर्क है कि आज का मीडिया इकोसिस्टम पहले से काफी बदल चुका है और केवल कुछ कंपनियों पर बोझ डालना संतुलित समाधान नहीं है।
TikTok की चुप्पी भी चर्चा में
अब तक TikTok ने इस प्रस्ताव पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन यह साफ है कि अगर कानून लागू होता है, तो TikTok भी इसके दायरे में आएगा। TikTok के लिए यह स्थिति खास इसलिए भी अहम है, क्योंकि शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स पर न्यूज और इंफॉर्मेशन कंटेंट की खपत तेजी से बढ़ी है। ऐसे में सरकार भविष्य में इस प्लेटफॉर्म को भी न्यूज इकोसिस्टम का हिस्सा मान रही है।
क्या इससे अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया संबंध प्रभावित होंगे?
दिलचस्प बात यह है कि प्रस्ताव के दायरे में आने वाली सभी प्रमुख कंपनियां अमेरिकी हैं। पहले भी अमेरिका में ऑस्ट्रेलिया के 2021 कानून को लेकर आलोचना हुई थी। कुछ अमेरिकी विश्लेषकों का मानना था कि यह कानून अमेरिकी टेक कंपनियों को असमान रूप से टारगेट करता है। हालांकि प्रधानमंत्री Anthony Albanese ने साफ कर दिया है कि ऑस्ट्रेलिया अपनी नीतियां राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय करेगा, न कि किसी बाहरी दबाव के आधार पर।
वैश्विक स्तर पर क्यों अहम है यह फैसला?
ऑस्ट्रेलिया का यह प्रस्ताव केवल स्थानीय कानून नहीं, बल्कि वैश्विक बहस का हिस्सा है। दुनिया के कई देशों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को पत्रकारिता के लिए भुगतान करना चाहिए। अगर ऑस्ट्रेलिया का यह मॉडल सफल होता है, तो संभव है कि अन्य देश भी इसी तरह के कानून लाएं। इससे टेक कंपनियों और मीडिया इंडस्ट्री के बीच आर्थिक संबंधों का नया मॉडल सामने आ सकता है।