cafe-3 draft: देश की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में इन दिनों एक नई बहस तेज़ हो गई है। वजह है – केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित कैफे-3 (कॉरपोरेट एवरेज फ्यूल इफिशिएंसी) उत्सर्जन मानदंड, जिसमें 909 किलोग्राम से कम वजन वाली पेट्रोल कारों को विशेष छूट देने का सुझाव दिया गया है। इस प्रावधान का देश की दो दिग्गज कंपनियों – महिंद्रा एंड महिंद्रा और टाटा मोटर्स ने खुलकर विरोध किया है। दोनों कंपनियों ने केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल को पत्र लिखकर चेतावनी दी है कि अगर ये छूट लागू होती है, तो भारत का इलेक्ट्रिक वाहन भविष्य पीछे की ओर लौट सकता है।
महिंद्रा का कहना है कि कैफे-3 का मौजूदा मसौदा कार कंपनियों को ईवी में निवेश करने से हतोत्साहित करेगा। यदि हल्की पेट्रोल कारों को अतिरिक्त राहत मिलती है, तो निर्माता कम उत्सर्जन वाले लक्ष्य को सिर्फ हाइब्रिड या थोड़े उन्नत पेट्रोल इंजनों के ज़रिये पूरा करने लगेंगे। इस स्थिति में इलेक्ट्रिक वाहन क्षेत्र में हो रही तेजी से प्रगति धीमी पड़ जाएगी। टाटा मोटर्स ने भी इसी तरह की चिंता जताते हुए कहा कि अगर भार आधारित छूट मिलती है तो कंपनियों के लिए बैटरी टेक्नोलॉजी और फ्यूल सेल जैसी आधुनिक तकनीकों पर निवेश करना आर्थिक रूप से कम आकर्षक हो जाएगा। यानी, उद्योग फिर से परंपरागत इंजन वाले मॉडलों पर निर्भर हो सकता है।
दोनों कंपनियों का तर्क है कि कारों में केवल वजन के आधार पर छूट देना बाजार में “बराबरी के अवसर” की भावना को चोट पहुंचाएगा। टाटा मोटर्स ने अपने पत्र में उल्लेख किया कि 909 किलो से कम वजन वाली कारों का लगभग पूरा बाजार एक ही कंपनी के पास है। ऐसी स्थिति में हल्की कारों को विशेष प्रोत्साहन देना बाकी निर्माताओं को प्रतिस्पर्धा से बाहर धकेल सकता है, जबकि वे इसी कीमत में अधिक सुरक्षित और आधुनिक तकनीक वाली कारें तैयार कर रहे हैं। कंपनियों ने यह भी कहा कि यह नीति देश को सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल कारों की दिशा में आगे बढ़ने से रोक सकती है।
कैफे नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वाहन निर्माता प्रति किलोमीटर कम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करने वाली कारें बनाएं। यह मानक औसत उत्सर्जन पर आधारित होता है, और यदि कोई कंपनी लक्ष्य के अनुरूप प्रदर्शन नहीं करती, तो ऊर्जा दक्षता ब्यूरो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर सकता है। कैफे-3 मानदंड 2028 से 2032 के बीच लागू होने हैं, और वर्तमान मसौदा पिछले साल जारी किया गया था। उद्योग संगठन SIAM ने मसौदे पर कई सुझाव दिए थे, लेकिन इसके बाद मारुति सुजुकी ने स्वतंत्र रूप से हल्की कारों के लिए छूट की मांग करते हुए सरकार को पत्र लिखा। इस कदम ने उद्योग जगत में साफ-साफ दो गुट बना दिए-ईवी-फोकस कंपनियां और छोटी कारों के समर्थक निर्माता।
महिंद्रा और टाटा द्वारा उठाए गए सवालों के जवाब में मारुति सुजुकी का पक्ष बिल्कुल अलग है। कंपनी का कहना है कि हल्की कारें स्वभाविक रूप से कम ईंधन खर्च करती हैं और कम प्रदूषण फैलाती हैं। दुनिया के कई बड़े बाजार-अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान-भी छोटी कारों की सुरक्षा और प्रोत्साहन के लिए अलग प्रावधान रखते हैं। ऐसे में, भारत का इन्हें बढ़ावा देना कहीं से भी गलत नहीं है। मारुति के अनुसार, कैफे-3 के मसौदे में बड़े एसयूवी और लग्जरी कारों के लिए जो 25% उत्सर्जन कटौती का लक्ष्य रखा गया है, वह हल्की कारों में 44% की अपेक्षित कटौती से काफी कम है। कंपनी के मुताबिक, छोटे वाहनों को राहत देना पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद है, क्योंकि इससे समग्र कार्बन उत्सर्जन तेजी से घटेगा।
इसके साथ ही, इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने की रफ्तार को लेकर भी उद्योग जगत में मिश्रित राय है। शुरुआती सालों में भारत का ईवी बाजार धीमी गति से बढ़ा, लेकिन अब बिक्री में रिकॉर्ड बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। महिंद्रा, टाटा और JSW एमजी मोटर्स जैसी कंपनियां ईवी तकनीक में भारी निवेश कर रही हैं और चाहती हैं कि सरकार ऐसी नीतियां बनाए जिनसे ईवी उद्योग को दीर्घकालिक लाभ मिले। JSW एमजी मोटर ने भी ऊर्जा मंत्री को लिखा है कि भार आधारित छूट इलेक्ट्रिक कारों के विस्तार पर नकारात्मक असर डाल सकती है।
कैफे-3 उत्सर्जन मानदंडों ने भारतीय ऑटो उद्योग में गंभीर मतभेद खड़े कर दिए हैं। एक तरफ ईवी निर्माता चाहते हैं कि नियम सख्त हों, ताकि पर्यावरण-अनुकूल वाहनों का प्रचार बढ़े। वहीं दूसरी ओर छोटी कारों पर निर्भर कंपनियां चाहती हैं कि हल्की और किफायती कारों को राहत दी जाए, ताकि आम उपभोक्ता के लिए वाहन खरीदना आसान बने रहे। सरकार किस दिशा में फैसला करती है, यह आने वाले महीनों में तय होगा, लेकिन इतना साफ है कि यह बहस भारत की ऑटोमोबाइल नीति के भविष्य को गहराई से प्रभावित करेगी।