भारत और अफ्रीकी देश Zambia के बीच क्रिटिकल मिनरल्स (Critical Minerals) को लेकर चल रही अहम बातचीत फिलहाल ठहराव का शिकार हो गई है। सूत्रों के मुताबिक, माइनिंग राइट्स (Mining Rights) को लेकर स्पष्ट आश्वासन न मिलने की वजह से यह वार्ता आगे नहीं बढ़ पा रही है।
India की ओर से इन चर्चाओं को फिर से शुरू करने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन मौजूदा स्थिति अभी भी अनिश्चित बनी हुई है। यह डील भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही थी, खासकर इलेक्ट्रिक व्हीकल और टेक्नोलॉजी सेक्टर के लिए।
क्या है पूरा मामला?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत और जाम्बिया के बीच Critical Minerals की खोज और खनन (Mining Exploration) को लेकर बातचीत चल रही थी। लेकिन जाम्बिया सरकार की ओर से खनन अधिकारों पर ठोस गारंटी न मिलने के कारण यह बातचीत फिलहाल रुक गई है।
सूत्रों ने बताया कि भारत इस प्रोजेक्ट में निवेश करने के लिए तैयार था, लेकिन बिना स्पष्ट माइनिंग राइट्स के कोई भी बड़ा निवेश जोखिम भरा हो सकता है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बन पाई।
कोबाल्ट और कॉपर क्यों हैं इतने अहम?
भारत को पिछले साल जाम्बिया में करीब 9,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में खनिज खोज (exploration) की अनुमति मिली थी। इसमें मुख्य रूप से कोबाल्ट (Cobalt) और कॉपर (Copper) जैसे महत्वपूर्ण खनिज शामिल हैं।
कोबाल्ट इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों और मोबाइल फोन में इस्तेमाल होने वाला एक प्रमुख तत्व है, जबकि कॉपर बिजली उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स और निर्माण क्षेत्र में व्यापक रूप से उपयोग होता है। ऐसे में इन संसाधनों तक पहुंच भारत की इंडस्ट्रियल और टेक्नोलॉजिकल जरूरतों के लिए बेहद जरूरी है।
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भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं Critical Minerals?
आज के समय में इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और ग्रीन एनर्जी की ओर तेजी से बढ़ते कदमों के चलते क्रिटिकल मिनरल्स की मांग लगातार बढ़ रही है। भारत भी EV मैन्युफैक्चरिंग और बैटरी प्रोडक्शन में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में काम कर रहा है।
अगर भारत को कोबाल्ट और कॉपर जैसे संसाधनों की स्थिर आपूर्ति मिलती है, तो यह देश की मेक इन इंडिया और एनर्जी ट्रांजिशन योजनाओं को मजबूती देगा। यही वजह है कि जाम्बिया के साथ यह डील रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जा रही थी।
भारत-जाम्बिया संबंधों पर असर
भारत और जाम्बिया के बीच लंबे समय से अच्छे कूटनीतिक और आर्थिक संबंध रहे हैं। भारत अफ्रीका में अपने निवेश और सहयोग को बढ़ाने की दिशा में लगातार प्रयास कर रहा है।
हालांकि, इस डील के अटकने से दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग की गति थोड़ी धीमी पड़ सकती है। फिर भी, विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों देश भविष्य में इस मुद्दे का समाधान निकाल सकते हैं और बातचीत फिर से शुरू हो सकती है।
ग्लोबल प्रतिस्पर्धा और चीन का प्रभाव
Critical Minerals के मामले में दुनिया भर में प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है। खासकर अफ्रीका में चीन पहले से ही मजबूत पकड़ बनाए हुए है और कई खनन परियोजनाओं में निवेश कर चुका है।
ऐसे में भारत के लिए जाम्बिया जैसे देशों के साथ साझेदारी करना जरूरी है, ताकि वह ग्लोबल सप्लाई चेन में अपनी स्थिति मजबूत कर सके। अगर यह डील सफल होती, तो भारत को चीन के मुकाबले एक बड़ा रणनीतिक फायदा मिल सकता था।
क्या फिर शुरू होगी बातचीत?
सूत्रों के अनुसार, भारत इस वार्ता को फिर से शुरू करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, जब तक जाम्बिया की ओर से माइनिंग राइट्स को लेकर स्पष्टता नहीं आती, तब तक इस डील के आगे बढ़ने की संभावना कम ही नजर आती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच बातचीत फिर से शुरू हो सकती है, लेकिन इसके लिए पारदर्शिता और भरोसे की जरूरत होगी। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह रणनीतिक डील किस दिशा में आगे बढ़ती है।
रणनीतिक डील पर अनिश्चितता
भारत-जाम्बिया के बीच Critical Minerals को लेकर रुकी बातचीत एक महत्वपूर्ण संकेत है कि ग्लोबल स्तर पर संसाधनों को लेकर प्रतिस्पर्धा कितनी बढ़ चुकी है। भारत के लिए यह डील सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी बेहद अहम थी।
अगर यह वार्ता सफल होती है, तो भारत को अपने EV और टेक्नोलॉजी सेक्टर में बड़ी मजबूती मिल सकती है। फिलहाल, सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या दोनों देश इस गतिरोध को खत्म कर पाएंगे या नहीं।
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