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The Industrial Empire - उद्योग, व्यापार और नवाचार की दुनिया | The World of Industry, Business & Innovation > नॉन रिन्यूएबल एनर्जी > भारत-अमेरिका ट्रेड डील 2025: छठे दौर की वार्ता टली, टैरिफ विवाद और रूस से तेल आयात बना बड़ी चुनौती
नॉन रिन्यूएबल एनर्जी

भारत-अमेरिका ट्रेड डील 2025: छठे दौर की वार्ता टली, टैरिफ विवाद और रूस से तेल आयात बना बड़ी चुनौती

Last updated: 23/08/2025 2:40 PM
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Industrial Empire
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भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर अनिश्चितता, टैरिफ विवाद और रूस-भारत ऊर्जा संबंधों के बीच छठे दौर की वार्ता टलने की संभावना
भारत-अमेरिका ट्रेड डील की छठी वार्ता पर संकट
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भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित बाइलेटरल ट्रेड एग्रीमेंट (BTA) को लेकर छठे दौर की बातचीत पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। अमेरिकी टीम की भारत यात्रा 25 अगस्त से 29 अगस्त तक तय थी, लेकिन अब संकेत मिल रहे हैं कि यह मुलाकात टल सकती है। दिलचस्प बात ये है कि यह खबर ऐसे समय में सामने आई है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अलास्का में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से लंबी बातचीत की, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।

पांच दौर की बातचीत पूरी, छठे दौर पर सस्पेंस
भारत और अमेरिका ने अब तक पांच राउंड की वार्ता पूरी कर ली है। छठा राउंड भारत में होना तय था, जिसमें कृषि, डेयरी और टैरिफ जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा होनी थी। लेकिन अब अमेरिकी अधिकारियों की यात्रा रीशेड्यूल होने की संभावना जताई जा रही है। सूत्रों की माने तो कार्यक्रम को स्थगित करने या नई तारीख तय करने की तैयारी चल रही है। आधिकारिक तौर पर अभी कोई कारण नहीं बताया गया है, लेकिन माना जा रहा है कि मौजूदा परिस्थितियों में अमेरिका का रुख कड़ा हो गया है।

टैरिफ विवाद बना सबसे बड़ी बाधा
अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर 50 फीसदी तक टैरिफ लगाने का फैसला किया है। पहली 25 प्रतिशत की किस्त 7 अगस्त से लागू हो चुकी है और दूसरी 25 प्रतिशत की किस्त 27 अगस्त से लागू होगी।

इस कदम का सीधा संबंध भारत के रूस से कच्चा तेल खरीदने से जोड़ा जा रहा है। अमेरिका लगातार चाहता है कि भारत, रूस से ऊर्जा आयात कम करे और पश्चिमी देशों के साथ खड़ा हो। लेकिन भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और लागत कम रखने के लिए रूस से आयात जारी रखे हुए है। यही कारण है कि टैरिफ विवाद गहराता जा रहा है।

पुतिन-ट्रंप मीटिंग का असर
भारत पर अमेरिकी दबाव उस समय और बढ़ गया जब ट्रंप और पुतिन की मुलाकात बेनतीजा रही। दोनों नेताओं ने आर्कटिक, व्यापार और अंतरिक्ष सहयोग पर चर्चा की, लेकिन यूक्रेन युद्ध पर कोई समझौता नहीं हुआ। विशेषज्ञ मानते हैं कि रूस के साथ भारत के मजबूत ऊर्जा और रक्षा संबंध अमेरिका के लिए चिंता का विषय हैं। यही वजह है कि अमेरिका अब व्यापारिक दबाव डालकर भारत को अपने पक्ष में झुकाने की कोशिश कर रहा है।

अमेरिका की मांग और भारत की चिंता
अमेरिका चाहता है कि उसे भारत के कृषि और डेयरी सेक्टर में व्यापक पहुंच मिले। लेकिन भारत इसके लिए तैयार नहीं है। कृषि और डेयरी भारतीय राजनीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संवेदनशील मुद्दे हैं। सरकार का मानना है कि विदेशी कंपनियों को इस क्षेत्र में ज्यादा जगह देने से छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है। यही वजह है कि भारत ने इन क्षेत्रों को लेकर समझौते में किसी भी तरह का लचीलापन नहीं दिखाया है।

मौजूदा ट्रेड रिलेशन की तस्वीर
फिलहाल भारत और अमेरिका का व्यापारिक रिश्ता मजबूत दिख रहा है। वाणिज्य मंत्रालय के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल-जुलाई 2025 में अमेरिका को भारत का निर्यात 21.64% बढ़कर 33.53 अरब डॉलर पर पहुंच गया। वहीं अमेरिका से आयात 12.33% बढ़कर 17.41 अरब डॉलर रहा। अमेरिका इस समय भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। दोनों देश चाहते हैं कि 2030 तक बाइलेटरल ट्रेड को मौजूदा 191 अरब डॉलर से बढ़ाकर 500 अरब डॉलर तक पहुंचाया जाए।

आगे का रास्ता क्या है?
बाइलेटरल ट्रेड एग्रीमेंट दोनों देशों के लिए अहम है। भारत को अमेरिका के विशाल बाजार तक पहुंच चाहिए, वहीं अमेरिका चाहता है कि भारतीय बाजार में उसकी पैठ और गहरी हो। लेकिन टैरिफ और रूस से जुड़ा मसला बातचीत को लगातार जटिल बना रहा है। फिलहाल अमेरिकी टीम की यात्रा स्थगित होने की खबर से यह साफ है कि भरोसे की डोर थोड़ी कमजोर पड़ी है। लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते इतने गहरे हैं कि बातचीत पूरी तरह रुकने की संभावना कम ही है।

भारत की रणनीति
भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर छाया अनिश्चितता का बादल केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक समीकरणों से भी जुड़ा है। अमेरिका चाहता है कि भारत उसके साथ खड़ा हो, जबकि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और घरेलू हितों के बीच संतुलन साध रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि क्या दोनों देश व्यापारिक मतभेदों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ पाते हैं, या फिर टकराव और गहराएगा। यह मुद्दा सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति का भी हिस्सा है और इसका असर दोनों देशों के रिश्तों पर लंबे समय तक दिख सकता है।

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