भारतीय अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों की दिशा तय करने में Reserve Bank of India (RBI) की मौद्रिक नीति अहम भूमिका निभाती है। पिछले दस वर्षों में केंद्रीय बैंक की नीतियों में कई बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। हाल ही में State Bank of India की रिसर्च रिपोर्ट ने 2016 से 2026 के बीच लिए गए ब्याज दर के फैसलों का विस्तृत विश्लेषण किया है।
रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान रेपो रेट ने पूरा आर्थिक चक्र देखा—पहले दरों में कटौती हुई, फिर तेजी से बढ़ोतरी और उसके बाद स्थिरता का दौर भी आया। इस पूरे समय में वैश्विक आर्थिक हालात, महामारी और महंगाई जैसे कई कारकों ने मौद्रिक नीति को प्रभावित किया।
महामारी और महंगाई ने बदली नीति की दिशा
रिपोर्ट बताती है कि 2020 में जब पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी की चपेट में थी, तब भारतीय अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए RBI ने तेजी से कदम उठाए। उस समय ब्याज दरों में कटौती कर बाजार में नकदी बढ़ाने की कोशिश की गई, ताकि कारोबार और निवेश को प्रोत्साहन मिल सके।
हालांकि यह स्थिति ज्यादा समय तक नहीं रही। 2022 में वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ने लगी और कच्चे तेल समेत कई जरूरी वस्तुओं की कीमतों में तेजी आई। इसके चलते केंद्रीय बैंक को अपनी नीति का रुख बदलना पड़ा और ब्याज दरों में बढ़ोतरी करनी पड़ी। इस तरह कुछ ही वर्षों में मौद्रिक नीति ढील से सख्ती की ओर मुड़ गई।
महंगाई लक्ष्य व्यवस्था के बाद कम हुए रेट हाइक
रिपोर्ट के अनुसार भारत में महंगाई लक्ष्य आधारित नीति लागू होने के बाद ब्याज दर बढ़ाने की घटनाओं में कमी आई है। पहले के वर्षों में केंद्रीय बैंक अक्सर दरों में बदलाव करता था, लेकिन नई व्यवस्था के बाद नीति ज्यादा संतुलित और स्थिर दिखाई देती है।
2010 से 2015 के बीच जहां ब्याज दरों में करीब 16 बार बढ़ोतरी की गई थी, वहीं उसके बाद के वर्षों में यह संख्या काफी कम रही। कई बार तो लंबे समय तक रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि मौद्रिक नीति अब ज्यादा स्थिर और पूर्वानुमानित हो गई है।
दो साल ऐसे भी जब रेपो रेट नहीं बदला
रिपोर्ट के मुताबिक कुछ साल ऐसे भी रहे जब पूरे वर्ष में रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया। खास तौर पर 2021 और 2024 ऐसे वर्ष रहे जब केंद्रीय बैंक ने दरों को स्थिर बनाए रखा। 2024 को रिपोर्ट में एक दिलचस्प साल बताया गया है। इसे एक ओर “फुल कंसेंसस” का साल कहा गया, क्योंकि कई फैसले पूरी सहमति से लिए गए। वहीं दूसरी ओर इसे “डिसेंट का साल” भी माना गया, क्योंकि नीति के रुख और भविष्य की दिशा को लेकर कुछ मतभेद भी सामने आए।
MPC के फैसलों में दिखी मजबूत सहमति
ब्याज दरों से जुड़े फैसले Monetary Policy Committee यानी MPC द्वारा लिए जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार इन बैठकों में ज्यादातर मौकों पर सदस्यों के बीच मजबूत सहमति देखने को मिली। दर तय करने के मामले में अक्सर सदस्य एकमत दिखाई दिए। हालांकि नीति के रुख और भविष्य के संकेतों को लेकर अलग-अलग राय सामने आती रही। इससे यह स्पष्ट होता है कि नीति निर्माण में चर्चा और बहस की गुंजाइश बनी रहती है।
शक्तिकांत दास के दौर में सबसे ज्यादा उतार-चढ़ाव
रिपोर्ट के मुताबिक RBI के पूर्व गवर्नर शक्तिकांत दास के कार्यकाल को मौद्रिक नीति के लिहाज से सबसे चुनौतीपूर्ण दौर माना जा सकता है। इस दौरान कोविड-19 महामारी, वैश्विक आपूर्ति संकट और बढ़ती महंगाई जैसे कई बड़े आर्थिक झटके आए।
इन परिस्थितियों ने केंद्रीय बैंक को तेजी से नीतिगत फैसले लेने के लिए मजबूर किया। कभी अर्थव्यवस्था को राहत देने के लिए दरें घटानी पड़ीं तो कभी महंगाई को नियंत्रित करने के लिए उन्हें बढ़ाना पड़ा। इसी वजह से इस अवधि में नीतियों में सबसे ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिला।
समय के साथ बदली MPC की भाषा
रिपोर्ट में मौद्रिक नीति समिति की बैठकों के मिनट्स का विश्लेषण आधुनिक तकनीकों की मदद से किया गया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (NLP) के जरिए यह समझने की कोशिश की गई कि अलग-अलग समय में नीति की भाषा और शब्दावली कैसे बदली।
पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल के समय नीति की भाषा अपेक्षाकृत स्थिर और महंगाई लक्ष्य पर केंद्रित रही। वहीं शक्तिकांत दास के कार्यकाल में महामारी और वैश्विक संकटों के कारण नीति की भाषा में अधिक लचीलापन और बदलाव दिखाई दिया। रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि मौजूदा नेतृत्व के शुरुआती दौर में नीति की नई दिशा उभरती नजर आ रही है।
वैश्विक मानकों के अनुरूप पारदर्शिता
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि MPC बैठकों के मिनट्स को 14 दिन बाद सार्वजनिक करना अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है। इसी तरह की व्यवस्था Federal Reserve में भी लागू है। इस प्रक्रिया से निवेशकों, विश्लेषकों और बाजार को यह समझने में मदद मिलती है कि केंद्रीय बैंक ने कोई फैसला किन परिस्थितियों और तर्कों के आधार पर लिया। इससे नीति निर्माण में पारदर्शिता बढ़ती है और वित्तीय बाजारों का भरोसा भी मजबूत होता है।