भारत और ब्रिटेन के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर स्कॉच व्हिस्की के आयात पर विवाद खड़ा हो गया है। भारत ने थोक में आयात होने वाले स्कॉच व्हिस्की कंसंट्रेट पर 75 फीसदी की रियायती आयात शुल्क दर लागू करने से इनकार कर दिया है। इस फैसले पर इंटरनेशनल स्पिरिट्स एंड वाइन्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ISWAI) ने आपत्ति जताई है। संस्था ने भारत के वाणिज्य मंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि यह कदम समझौते की शर्तों के अनुरूप नहीं है। इससे भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापारिक संबंधों पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
क्या है पूरा विवाद?
भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता 15 जुलाई से लागू हुआ था। इसके तहत स्कॉच व्हिस्की की कुछ श्रेणियों पर आयात शुल्क तत्काल 150 फीसदी से घटाकर 75 फीसदी करने और अगले 10 वर्षों में इसे धीरे-धीरे 40 फीसदी तक लाने की व्यवस्था की गई थी। ब्रिटेन को उम्मीद थी कि इससे भारतीय बाजार में उसके उत्पादों की पहुंच बढ़ेगी।
हालांकि, विवाद थोक में आयात होने वाले स्कॉच कंसंट्रेट की कस्टम श्रेणी को लेकर है। भारतीय जांच एजेंसियों का मानना है कि इस गाढ़े मिश्रण को रियायती शुल्क का लाभ नहीं मिलना चाहिए। राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI) ने इसी सिलसिले में डियाजियो और पेर्नोड रिकार्ड के कार्यालयों की तलाशी ली और अधिकारियों से पूछताछ की। जांच एजेंसियों को संदेह है कि कम आयात शुल्क का लाभ लेने के लिए आयातित उत्पादों की कस्टम श्रेणी गलत बताई गई हो सकती है। हालांकि, यह आरोप अभी जांच के दायरे में हैं।
डियाजियो और पेर्नोड रिकार्ड का क्या कहना है?
डियाजियो और पेर्नोड रिकार्ड जैसी कंपनियां भारत में बड़े पैमाने पर कारोबार करती हैं। दोनों कंपनियों का कहना है कि उन्होंने नियमों का उल्लंघन नहीं किया है और वे जांच एजेंसियों के साथ सहयोग कर रही हैं।
ये कंपनियां ब्रिटेन से स्कॉच कंसंट्रेट आयात करती हैं, जिसका इस्तेमाल भारत में रॉयल स्टैग, ब्लेंडर्स प्राइड और मैकडॉवेल्स जैसे लोकप्रिय व्हिस्की ब्रांडों के उत्पादन में किया जाता है। कंपनियों का तर्क है कि FTA के तहत तय रियायती आयात शुल्क का लाभ इस कंसंट्रेट पर भी मिलना चाहिए।
ISWAI ने चेतावनी दी है कि यदि थोक आयात को रियायती दर से बाहर रखा गया, तो समझौते से मिलने वाले व्यापारिक लाभ प्रभावित हो सकते हैं।
ब्रिटेन ने भारत से बातचीत शुरू की
ब्रिटेन सरकार ने कहा है कि इस मामले को सुलझाने के लिए भारत के साथ बातचीत की जा रही है। ब्रिटेन की स्कॉच व्हिस्की एसोसिएशन (SWA) ने भी थोक आयात को उद्योग के लिए महत्वपूर्ण बताया है और समझौते की शर्तों के स्पष्ट क्रियान्वयन पर जोर दिया है।
भारतीय शराब उद्योग पर क्या होगा असर?
भारत का शराब बाजार करीब 65 अरब डॉलर का बताया जाता है। क्रिसिल के मुताबिक, देश में आयात होने वाली स्पिरिट्स का बड़ा हिस्सा ब्रिटेन से आता है। ऐसे में आयात शुल्क और कस्टम वर्गीकरण को लेकर अनिश्चितता का असर विदेशी कंपनियों की लागत, मूल्य निर्धारण और कारोबारी योजनाओं पर पड़ सकता है।
फिलहाल विवाद का समाधान भारत की जांच और दोनों देशों के बीच बातचीत पर निर्भर करेगा। यदि कंसंट्रेट पर रियायती शुल्क को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तो कंपनियों के आयात खर्च और बाजार में प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ सकता है। इसलिए उद्योग की नजर सरकार के अगले फैसले पर बनी हुई है।