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The Industrial Empire - उद्योग, व्यापार और नवाचार की दुनिया | The World of Industry, Business & Innovation > फर्श से अर्श तक > शुभांशु शुक्ला – आसमान छूने, ज़मीन से निकली कहानी
फर्श से अर्श तक

शुभांशु शुक्ला – आसमान छूने, ज़मीन से निकली कहानी

Shashank Pathak
Last updated: 15/07/2025 5:28 PM
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Shashank Pathak
ByShashank Pathak
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शुभांशु शुक्ला - फाइल फोटो
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जब अंतरिक्ष में झंडा फहराने की बात होती है, तो राकेश शर्मा का नाम सबसे पहले ज़ुबां पर आता है। लेकिन अब इस गौरवशाली सूची में एक और भारतीय जुड़ गया है – ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला। 2025 में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) तक की ऐतिहासिक उड़ान भरकर न सिर्फ इतिहास रचा, बल्कि यह भी दिखाया कि साधारण पृष्ठभूमि से निकला इंसान भी अगर ठान ले, तो अंतरिक्ष तक पहुंच सकता है।

लखनऊ की गलियों से आसमान की ऊंचाई तक
शुभांशु का जन्म उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। उनके पिता शंभू दयाल शुक्ला सरकारी सेवा में थे और मां आशा शुक्ला एक गृहिणी हैं। तीन भाई-बहनों में सबसे छोटे शुभांशु ने बचपन से ही अनुशासन और जिम्मेदारी देखी। पढ़ाई में तेज और सपना बड़ा, यही दो चीजें उन्हें अलग बनाती थीं। लखनऊ के सिटी मॉन्टेसरी स्कूल से शिक्षा पूरी करने के बाद, साल 1999 में कारगिल युद्ध से प्रेरित होकर उन्होंने रक्षा सेवाओं की ओर रुख किया।

वायुसेना में उड़ान की शुरुआत
राष्ट्रीय रक्षा अकादमी से कंप्यूटर साइंस में स्नातक की डिग्री लेने के बाद शुभांशु ने 2006 में भारतीय वायुसेना में फ्लाइंग ऑफिसर के रूप में अपनी सेवा शुरू की। वो एक योग्य टेस्ट पायलट हैं और उन्होंने सुखोई-30MKI, मिग-21, मिग-29 जैसे लड़ाकू विमानों पर 2000 घंटे से अधिक की उड़ान भरी है। उनकी कड़ी मेहनत, तकनीकी समझ और नेतृत्व क्षमता ने उन्हें ग्रुप कैप्टन के पद तक पहुंचा दिया।

जब सपना बना मिशन
साल 2019 में ISRO ने जब अपने मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम ‘गगनयान’ के लिए चार भारतीय पायलटों का चयन किया, तब शुभांशु उनमें शामिल थे। उन्हें रूस के यूरी गगारिन ट्रेनिंग सेंटर में अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण के लिए भेजा गया। फिर बेंगलुरु स्थित ISRO केंद्र में उन्होंने मिशन-विशिष्ट ट्रेनिंग पूरी की और इसी दौरान IISc से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में मास्टर्स भी किया।

एक्सिओम-4 मिशन: भारत की नई उड़ान
अंतरराष्ट्रीय सहयोग के तहत शुभांशु को स्पेसएक्स और नासा के साथ मिलकर एक्सिओम मिशन 4 के लिए मिशन पायलट नियुक्त किया गया। 25 जून 2025 को उन्होंने अमेरिका के कैनेडी स्पेस सेंटर से उड़ान भरी और 26 जून को ISS पहुंचे। यहां उन्होंने 18 दिन बिताए, लगभग 60 वैज्ञानिक प्रयोग किए जिनमें से सात स्वदेशी तकनीक पर आधारित थे।

एक प्रेरणा, एक प्रतीक
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से वे सकुशल वापस आ चुके हैं। उनका स्पेसक्राफ्ट पूरी तरह स्वचालित प्रणाली से कैलिफोर्निया तट पर स्प्लैशडाउन हुआ। धरती पर वापसी के बाद उन्हें अब कुछ दिन की रिहैब प्रक्रिया से गुजरना होगा ताकि शरीर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के अनुसार ढल सके। उनके द्वारा किया गया यह मिशन न सिर्फ तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण था, बल्कि यह भारत के गगनयान प्रोग्राम की नींव भी है।

निजी जीवन में भी विनम्र नायक
शुभांशु का विवाह कामना मिश्रा से हुआ है, जो एक दंत चिकित्सक हैं और उनकी स्कूल की सहपाठी भी रही हैं। उनका एक बेटा है। सादगी और समर्पण से भरी इस कहानी में कहीं भी अहंकार की जगह नहीं।

हर भारतवासी की प्रेरणा
शुभांशु शुक्ला की यह यात्रा एक वैज्ञानिक मिशन होने के साथ-साथ एक प्रेरणादायक कहानी है। वह हर उस युवा के लिए मिसाल हैं जो छोटे शहरों से बड़ा सपना देखते हैं। उनका सफर यह साबित करता है कि अगर इरादा मज़बूत हो और देश की मिट्टी से जुड़ाव हो, तो अंतरिक्ष भी दूर नहीं।

TAGGED:AX-4 MissionFeaturedIndustrial EmpireInternational Space StationISRONASAscience newsshubhanshu shuklaspacex
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