भारत की अर्थव्यवस्था को मापने का तरीका अब बदलने जा रहा है। सरकार इस सप्ताह रियल GDP (सकल घरेलू उत्पाद) की गणना के तरीके में बड़ा सुधार लागू करने की तैयारी में है। इस बदलाव का उद्देश्य GDP आंकड़ों को अधिक सटीक बनाना और लंबे समय से उठ रही अर्थशास्त्रियों की चिंताओं को दूर करना है। नई व्यवस्था के तहत अब महंगाई मापने वाले अधिक विस्तृत प्राइस डेटा का इस्तेमाल होगा, जिससे देश की वास्तविक आर्थिक वृद्धि की तस्वीर पहले से ज्यादा स्पष्ट हो सकेगी।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, संशोधित राष्ट्रीय लेखा श्रृंखला (Revised National Accounts Series) का औपचारिक ऐलान 27 फरवरी को किया जाएगा। इसके साथ ही 2022–23 को आधार वर्ष मानकर नई GDP सीरीज जारी होगी और पिछले चार वर्षों के संशोधित आंकड़े (बैक-सीरीज) भी सामने आएंगे।
पुराने तरीके पर क्यों उठे सवाल
अब तक भारत रियल GDP को नॉमिनल GDP से महंगाई का प्रभाव हटाकर (डिफ्लेट करके) मापता रहा है। इसके लिए मुख्य रूप से होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) आधारित प्राइस इंडेक्स का इस्तेमाल किया जाता था। कई अर्थशास्त्रियों ने इस पर आपत्ति जताई थी, क्योंकि यह तरीका उपभोक्ता स्तर पर कीमतों में बदलाव को उतनी बारीकी से नहीं पकड़ता जितना कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) करता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ लंबे समय से सुझाव दे रहे थे कि GDP गणना में अधिक विस्तृत और वास्तविक कीमत डेटा शामिल किया जाए। अब सरकार इसी दिशा में कदम बढ़ा रही है।
अब ऐसे तय होगी रियल GDP
नए ढांचे के तहत GDP गणना में CPI और WPI दोनों से जुड़े लगभग 500–600 मूल्य मदों (प्राइस आइटम) का इस्तेमाल किया जाएगा। पहले यह संख्या करीब 180 के आसपास थी। अधिक आइटम शामिल होने से कीमतों का प्रभाव अधिक सटीक तरीके से समायोजित किया जा सकेगा। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के सचिव सौरभ गर्ग के अनुसार, यह नई पद्धति तब तक लागू रहेगी जब तक संशोधित WPI सीरीज जारी नहीं हो जाती। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य डेटा की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बढ़ाना है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां इनपुट और आउटपुट कीमतों में बड़ा अंतर होता है।
डबल डिफ्लेशन: क्या है नया गणित
GDP मापन में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव “डबल डिफ्लेशन” पद्धति की ओर बढ़ना है। इस पद्धति में उत्पादन (आउटपुट) और लागत (इनपुट) की कीमतों को अलग-अलग समायोजित किया जाता है। इससे वास्तविक वैल्यू एडेड का अधिक सटीक अनुमान मिलता है। पहले इस्तेमाल होने वाले “सिंगल डिफ्लेशन” तरीके में केवल एक ही प्राइस इंडेक्स से समायोजन किया जाता था, जिससे खासकर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में ग्रोथ के आकलन पर सवाल उठते थे। नई पद्धति इन कमियों को दूर करने का प्रयास है।
IMF की चिंता के बाद तेज हुआ सुधार
हाल के महीनों में अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने भी भारत के GDP मापन ढांचे पर सवाल उठाए थे। International Monetary Fund ने भारत के राष्ट्रीय खातों के ढांचे में कुछ कमजोरियों की ओर संकेत किया था, जिनमें पुराना आधार वर्ष (2011–12), थोक कीमतों पर अधिक निर्भरता और सिंगल डिफ्लेशन का ज्यादा उपयोग शामिल था। इसके बाद सांख्यिकी प्रणाली में व्यापक सुधार की प्रक्रिया तेज हुई। नई खुदरा महंगाई श्रृंखला, औद्योगिक उत्पादन सूचकांक और थोक महंगाई मापन में भी बदलाव की दिशा में काम जारी है।
ग्रोथ आंकड़ों पर क्या असर पड़ेगा
विशेषज्ञों का मानना है कि नए तरीके से GDP की गणना अधिक यथार्थवादी होगी। इससे कुछ सेक्टरों में ग्रोथ दर पहले से अलग दिखाई दे सकती है, खासकर मैन्युफैक्चरिंग में। पुरानी सीरीज के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था 2025–26 में लगभग 7.4% बढ़ने का अनुमान है, जबकि 2024–25 में यह 6.5% थी। नॉमिनल GDP इस वर्ष करीब 8% बढ़ने का अनुमान है। नई सीरीज आने के बाद इन आंकड़ों में संशोधन संभव है, क्योंकि कीमत समायोजन की पद्धति बदल जाएगी।
अर्थव्यवस्था की तस्वीर होगी ज्यादा साफ
यह बदलाव केवल तकनीकी सुधार नहीं बल्कि आर्थिक नीति के लिए भी महत्वपूर्ण है। अधिक सटीक GDP आंकड़े सरकार को बेहतर नीति निर्णय लेने में मदद करेंगे और निवेशकों को अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति समझने में सहायक होंगे। सरल शब्दों में कहें तो अब भारत की आर्थिक वृद्धि को मापने का पैमाना अधिक आधुनिक और विश्वसनीय बनने जा रहा है। 27 फरवरी को घोषित होने वाली नई GDP सीरीज देश की विकास कहानी को नई दृष्टि से पेश कर सकती है।