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The Industrial Empire - उद्योग, व्यापार और नवाचार की दुनिया | The World of Industry, Business & Innovation > एनर्जी > अमेरिका ने Rosneft और Lukoil पर लगाई रोक, भारत तक जारी रहेगा रूसी तेल का प्रवाह!
एनर्जी

अमेरिका ने Rosneft और Lukoil पर लगाई रोक, भारत तक जारी रहेगा रूसी तेल का प्रवाह!

Last updated: 25/10/2025 4:28 PM
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Industrial Empire
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Rosneft और Lukoil पर अमेरिकी प्रतिबंध के बावजूद भारत को जारी रूसी तेल आपूर्ति
अमेरिका के Rosneft और Lukoil पर नए प्रतिबंधों के बावजूद भारत तक जारी है सस्ते रूसी तेल की सप्लाई। (प्रतीकात्मक इमेज)
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नई दिल्ली: अमेरिका और यूरोप के नए प्रतिबंधों के बीच एक सवाल सबसे ज़्यादा चर्चा में है। क्या भारत को अब भी रूस से सस्ता तेल मिलेगा? जवाब है, “हाँ, फिलहाल तो मिलेगा।” हाल ही में अमेरिका ने रूस की दो सबसे बड़ी तेल कंपनियों Rosneft और Lukoil पर नई सैंक्शंस (प्रतिबंध) लागू किए हैं, लेकिन इन प्रतिबंधों का असर भारत के साथ रूस के 69 बिलियन डॉलर के तेल व्यापार पर फिलहाल सीमित ही दिख रहा है।

रूसी तेल पर नहीं, कंपनियों पर लगा प्रतिबंध
इन अमेरिकी सैंक्शंस का दायरा रूस की तेल कंपनियों तक सीमित है, तेल खुद इन प्रतिबंधों में शामिल नहीं है। इसका मतलब है कि अगर कोई अन्य रूसी कंपनी तेल बेच रही है और वह प्रतिबंध सूची में नहीं है, तो भारतीय रिफाइनर पूरी तरह कानूनी तरीके से उससे तेल खरीद सकते हैं। इसी वजह से भारत की तेल खरीद पर तात्कालिक प्रभाव नहीं पड़ा है।

Rosneft और Lukoil से भारत लेता है 70% तेल
साल 2025 में भारत की लगभग 70 प्रतिशत तेल आपूर्ति इन्हीं दो कंपनियों Rosneft और Lukoil से आई है। अगर इसमें Surgutneftegaz की आपूर्ति जोड़ दी जाए, तो यह हिस्सा 78 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। हालांकि, यह अभी साफ नहीं है कि जनवरी 2025 में अमेरिकी प्रतिबंध झेल रही Surgutneftegaz भारत को तेल कैसे भेज रही है।

क्या दिसंबर में हो सकता है असर?
एक वरिष्ठ ट्रेडर के मुताबिक, दिसंबर की डिलीवरी पर थोड़ा असर पड़ सकता है क्योंकि ऑर्डर पहले से दिए जा चुके हैं और रूस के पास तुरंत वैकल्पिक व्यवस्था करने का समय नहीं है। हालांकि, यह असर अल्पकालिक रहने की उम्मीद है, क्योंकि रूस तीसरे पक्ष या मध्यस्थ कंपनियों के ज़रिए आपूर्ति जारी रख सकता है।

अमेरिकी और यूरोपीय रणनीति के पीछे राजनीति
कोलंबिया यूनिवर्सिटी की एनर्जी विशेषज्ञ तातियाना मित्रोवा का कहना है कि ये प्रतिबंध आर्थिक होने के साथ भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हैं। उनका मानना है कि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका और यूरोप इन पाबंदियों को कितनी सख्ती से लागू करते हैं।

रूस की कंपनियों का वैश्विक उत्पादन
रॉसनेफ्ट और लुकोइल दोनों मिलकर करीब 5 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) तेल का उत्पादन करती हैं। इसमें से अकेली Rosneft ने भारत को 9.1 लाख बैरल प्रति दिन तेल सप्लाई किया जो भारत की कुल रूसी तेल आपूर्ति का आधा है। वहीं Lukoil ने करीब 3 लाख बैरल प्रति दिन सप्लाई दी।

रूस पर पहले भी लगे थे प्रतिबंध
यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका ने रूस के तेल उत्पादकों को निशाना बनाया हो। फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद Gazprom Neft और Surgutneftegaz पर भी सैंक्शन लगाए गए थे। इसके बावजूद Surgutneftegaz ने भारत को इस साल लगभग 1.59 लाख बैरल प्रति दिन तेल भेजा जो रूस की कुल आपूर्ति का लगभग 9% है।

EU ने LNG पर लगाया प्रतिबंध, पर कंपनियों को दी छूट
यूरोपीय संघ (EU) ने इस सप्ताह रूस के लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) पर प्रतिबंध लगाया है, लेकिन Rosneft और Lukoil को इससे बाहर रखा गया। EU के सैंक्शन विशेषज्ञ जॉर्ज वोलोशिन के अनुसार, यूरोप की घरेलू ऊर्जा ज़रूरतों के कारण ये कंपनियां छूट में रहीं। उन्होंने यह भी बताया कि EU ने Lukoil की UAE-स्थित ट्रेडिंग यूनिट पर तो प्रतिबंध लगाया, लेकिन उसकी स्विस कंपनी Litasco SA को नहीं छुआ यानी प्रतिबंधों में तकनीकी खामियां बनी रहीं।

भारत केवल UN प्रतिबंध मानता है
भारत की नीति स्पष्ट है देश केवल संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को मानता है। सरकारी सूत्रों ने कहा कि रूस के तेल पर कोई आधिकारिक प्रतिबंध नहीं है, इसलिए भारतीय कंपनियां स्वतंत्र रूप से व्यापार कर सकती हैं। हाँ, कुछ बैंक और प्राइवेट कंपनियां अपने जोखिम का आंकलन करते हुए लेन-देन रोक सकती हैं।

अमेरिका ने क्यों नहीं रोका रूसी तेल?
भारत के ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा का कहना है कि अमेरिका और यूरोप ने जानबूझकर रूसी तेल पर सीधा प्रतिबंध नहीं लगाया। अगर ऐसा होता तो तेल की कीमतें आसमान छू लेतीं और इससे अमेरिका में ईंधन महंगाई और चुनावी असर दोनों होते। इसलिए पश्चिमी देश कंपनियों को निशाना बनाकर आंशिक दबाव बना रहे हैं।

तेल की कीमतें अभी स्थिर, बाजार शांत
ब्रेंट क्रूड फिलहाल 65 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। सिंगापुर स्थित ऊर्जा विशेषज्ञ वंदना हरी के अनुसार, अगर रूसी तेल पर सीधे प्रतिबंध लगाए जाते तो कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली जातीं। यह अमेरिका और यूरोप दोनों के लिए राजनीतिक जोखिम बन सकता था।

भारत के रिफाइनरों की स्थिति
सरकारी कंपनियां जैसे इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम अब ऐसे वैकल्पिक रास्ते खोज रही हैं जिनसे वे गैर-प्रतिबंधित रूसी संस्थाओं से तेल खरीद सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि रूसी तेल पर मिलने वाला डिस्काउंट अब 4–5 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकता है। हालांकि, रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी निजी कंपनी को अपने लंबे सप्लाई समझौते में बदलाव करना पड़ सकता है, क्योंकि अमेरिकी सैंक्शन के तहत विदेशी बैंक ऐसे लेन-देन से बच सकते हैं।

अगले महीनों में स्थिति कैसी रहेगी?
तेल बाज़ार पर नजर रखने वाली कंपनी Kpler के अनुसार, नवंबर तक रूस से भारत को तेल आपूर्ति सुचारू रहेगी क्योंकि 1.5 मिलियन बैरल प्रति दिन का लोड पहले ही शिपमेंट में है। दिसंबर और जनवरी में कुछ गिरावट संभव है, लेकिन उसके बाद आपूर्ति फिर स्थिर हो जाएगी।

तीसरे पक्ष की भूमिका बढ़ेगी
रूस अब तेल बेचने के लिए दुबई, हांगकांग और अन्य तीसरे देशों में स्थित कंपनियों का सहारा ले सकता है। ऐसे कई ट्रेड अब और भी अस्पष्ट हो जाएंगे, जिससे यह समझना मुश्किल होगा कि असल स्रोत कौन है। वैश्विक बाजार में यह रूस की “स्मार्ट रणनीति” मानी जा रही है, जिससे वह पाबंदियों के बावजूद तेल व्यापार बनाए रख सके।

अगर रूसी तेल गायब हुआ तो बढ़ेंगे दाम
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसी वजह से रूस का तेल वैश्विक बाज़ार से हट गया, तो मध्य पूर्व का तेल तीन गुना महंगा हो जाएगा। रूस का तेल दुनिया की कुल आपूर्ति का लगभग 12% है और इसे अचानक हटाना किसी देश के लिए भी संभव नहीं।

भारत का फायदा फिलहाल बरकरार
कुल मिलाकर, नए अमेरिकी प्रतिबंधों का भारत-रूस तेल व्यापार पर फिलहाल बड़ा असर नहीं पड़ा है। भारत को अभी भी सस्ता रूसी तेल मिल रहा है, जिससे उसकी ऊर्जा लागत और आयात बिल दोनों नियंत्रण में हैं। लेकिन आने वाले महीनों में स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका और यूरोप इन पाबंदियों को कितनी सख्ती से लागू करते हैं और रूस उन्हें कितनी चतुराई से टालता है।

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