म्यूचुअल फंड में निवेश करते समय ज्यादातर निवेशक पिछले तीन या पांच साल के रिटर्न को महत्व देते हैं। लगातार बेहतर प्रदर्शन करने वाला फंड उन्हें निवेश के लिए आकर्षक लगता है। लेकिन ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि आज टॉप रैंकिंग में शामिल फंड के लिए भविष्य में भी वही प्रदर्शन बनाए रखना आसान नहीं है। ऐसे में निवेशकों के लिए केवल पुराने रिटर्न के आधार पर फंड चुनना जोखिम भरा हो सकता है।
फंड्सइंडिया की अक्टूबर 2026 की वेल्थ कन्वर्सेशन्स रिपोर्ट के मुताबिक, पांच साल में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले इक्विटी म्यूचुअल फंड में से औसतन केवल 21 फीसदी ही अगले पांच साल तक अपनी टॉप-25 फीसदी वाली रैंकिंग बरकरार रख पाए। तीन साल की अवधि में यह आंकड़ा 26 फीसदी रहा। यानी, पांच साल में शीर्ष प्रदर्शन करने वाले लगभग चार में से तीन-चार फंड अगले पांच साल में अपनी जगह बनाए रखने में सफल नहीं रहे।
टॉप फंड्स की रैंकिंग में क्यों होता है बदलाव?
रिपोर्ट में पहले तीन और पांच साल के रिटर्न के आधार पर फंड्स की रैंकिंग तय की गई। इसके बाद अगली समान अवधि में उनके प्रदर्शन का आकलन किया गया। नतीजों में अलग-अलग अवधियों के दौरान काफी अंतर देखने को मिला।
उदाहरण के लिए, 2007 से 2011 के दौरान टॉप-25 फीसदी फंड्स में शामिल योजनाओं में से केवल 4 फीसदी ही 2012 से 2016 के दौरान अपनी जगह बनाए रख सकीं। वहीं, 2004 से 2008 की अवधि के शीर्ष फंड्स में से केवल 7 फीसदी 2009 से 2013 के दौरान भी शीर्ष श्रेणी में रहे।
इसके उलट, 2012 से 2014 के दौरान शीर्ष 25 फीसदी फंड्स में शामिल करीब 66 फीसदी योजनाएं 2015 से 2017 के दौरान भी इसी श्रेणी में बनी रहीं। इससे स्पष्ट होता है कि फंड्स की रैंकिंग बरकरार रखने की क्षमता बाजार की परिस्थितियों और अध्ययन की अवधि के अनुसार बदल सकती है।
बाजार की चाल बदलने से प्रभावित होता है रिटर्न
म्यूचुअल फंड का प्रदर्शन कई कारकों पर निर्भर करता है। इनमें बाजार की स्थिति, फंड मैनेजर की निवेश रणनीति, पोर्टफोलियो में शामिल शेयर और अलग-अलग कंपनियों या सेक्टर का प्रदर्शन प्रमुख हैं।
उदाहरण के लिए, स्मॉलकैप शेयरों में तेजी के दौरान इन कंपनियों में ज्यादा निवेश करने वाले फंड बेहतर रिटर्न दे सकते हैं। लेकिन बाजार का रुझान लार्जकैप शेयरों की तरफ बदलने पर उनकी रैंकिंग नीचे आ सकती है। इसी तरह, फार्मा, बैंकिंग या दूसरे सेक्टर पर केंद्रित फंड्स का प्रदर्शन भी संबंधित क्षेत्र की परिस्थितियों के साथ बदल सकता है।
यह भी जरूरी नहीं कि रैंकिंग गिरने का मतलब फंड में नुकसान होना है। संभव है कि फंड ने सकारात्मक रिटर्न दिया हो, लेकिन दूसरी योजनाओं ने उससे बेहतर प्रदर्शन किया हो।
निवेश से पहले किन बातों पर दें ध्यान?
निवेशकों को फंड चुनते समय पिछले रिटर्न के साथ उसके बेंचमार्क और समान श्रेणी के फंड्स से तुलना करनी चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि फंड ने बाजार की तेजी और गिरावट के दौरान कैसा प्रदर्शन किया है और बेहतर रिटर्न हासिल करने के लिए कितना जोखिम लिया है।
इसके अलावा, निवेश का लक्ष्य, समयावधि और जोखिम सहने की क्षमता भी फंड चुनने में अहम भूमिका निभाते हैं। केवल हाल की टॉप रैंकिंग देखकर निवेश करना समझदारी नहीं है।
कुल मिलाकर, म्यूचुअल फंड का पिछला प्रदर्शन उसके भविष्य के रिटर्न की गारंटी नहीं देता। इसलिए निवेशकों को किसी योजना का मूल्यांकन कई पहलुओं के आधार पर करना चाहिए और जरूरत पड़ने पर योग्य वित्तीय सलाहकार की मदद लेनी चाहिए।