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The Industrial Empire - उद्योग, व्यापार और नवाचार की दुनिया | The World of Industry, Business & Innovation > फर्श से अर्श तक > “600 रुपये से शुरू कर जोड़ा एक जूता-साम्राज्य – उपेन्द्र सिंह लवली की बेमिसाल दास्तान”
फर्श से अर्श तक

“600 रुपये से शुरू कर जोड़ा एक जूता-साम्राज्य – उपेन्द्र सिंह लवली की बेमिसाल दास्तान”

Last updated: 14/07/2025 4:58 PM
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Industrial empire correspondent
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कभी किसी ने सोचा होगा कि आगरा की हींग की मंडी की एक तंग गली से शुरू हुआ सफर एक दिन ग्लोबल फुटवियर मैप पर आगरा का झंडा गाड़ देगा? ये कहानी है एक ऐसे शख्स की जिसने न तामझाम से शुरुआत की, न किसी बड़ी विरासत से — बस साथ थी मेहनत, सीखने की प्यास और एक न मिटने वाला जुनून। नाम है – उपेन्द्र सिंह ‘लवली’, जो आज न सिर्फ एक सफल शू एक्सपोर्टर हैं, बल्कि Agra Shoe Manufacturing Association के अध्यक्ष भी हैं। उनकी कहानी शुरू होती है सिर्फ ₹600 महीने की तनख्वाह से और आज वहीं इंसान लाखों-करोड़ों की इंडस्ट्री चला रहा है।

जहां से शुरू हुआ सब – एक स्टोर और एक सपना
“पहली नौकरी में मैं गया था स्टोरकीपर बनकर… ₹600 मिलते थे।” लेकिन सोच थी बड़ी। कहते हैं, “एक डेढ़ साल में प्रोडक्शन मैनेजर बन गया। वहां से समझ में आया, जब दूसरों का काम संभाल सकता हूं, तो खुद का क्यों नहीं?” पर सपनों के रास्ते आसान नहीं होते। मन में डर भी था समाज की बातें भी और परिवार की ज़िम्मेदारी भी। लेकिन जैसे ही दिल ने कहा “अब बहुत हुआ”, एक छोटी सी फैक्ट्री में 8 जोड़ी जूते प्रतिदिन बनाने से एक नया अध्याय शुरू हुआ।

हींग की मंडी की सुबहें और अधूरी नींदें
जिस वक्त शहर नींद में होता था, लवली साहब सुबह 6 बजे एक डिज़ाइनर के घर पहुंच जाते – नाश्ता बनाते, बर्तन उठाते, बस इस उम्मीद में कि कुछ नया सीखने को मिले। रात जब डिज़ाइनर सोता, तब लौटते… मन में संतोष होता कि आज फिर कुछ सीखा। यही तपस्या थी जिसने उन्हें साधक से सरताज बना दिया।

जूतों की जोड़ी नहीं, इरादों की कतार बनी
धीरे-धीरे 8 से 100, फिर 200 और फिर 300 जोड़ी प्रतिदिन बनने लगे। “तब जूते बनाना समाज में ‘छोटा काम’ माना जाता था”, वे बताते हैं, “पर मैंने कभी इस सोच को स्वीकार नहीं किया।” उनका मानना था – कोई भी काम छोटा नहीं, सोच बड़ी होनी चाहिए।

आगरा का नाम, हर पांव की पहचान
आज आगरा की पहचान सिर्फ ताजमहल तक सीमित नहीं, बल्कि जूतों के हर ब्रांड में उसकी छाप है। “देश के 70 फीसदी जूते आगरा में बनते हैं। Bata हो, Liberty – बिना आगरा के कोई जूता पूरा नहीं। उनकी बात में दम है – “जैसे सब्ज़ी बिना नमक के अधूरी लगती है, वैसे ही भारत का फुटवियर बाजार आगरा के बिना अधूरा है।”

सरकार की बदलती सोच, व्यापार की उड़ान
पहले व्यापारियों को सरकार से उम्मीद नहीं होती थी। “हम दरवाज़े खटखटाते थे,” वो याद करते हैं, “अब सरकार खुद आ रही है – MSME, SIDBI, उद्यम रजिस्ट्रेशन जैसी योजनाओं से।” अब लवली साहब सरकारी योजनाओं के सक्रिय उपयोगकर्ता हैं और दूसरों को भी प्रेरित करते हैं। “सोशल मीडिया, डिजिटल इंडिया और नई सोच ने छोटे व्यवसायों को बड़े सपने देखने का साहस दिया है।”

निर्यात के बादल, लेकिन रोशनी की किरण भी
फुटवियर एक्सपोर्ट की राह हमेशा आसान नहीं रही। यूरोप की आर्थिक स्थिति, रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे वैश्विक संकटों ने रफ्तार रोकी। “हमारा सबसे बड़ा मार्केट जर्मनी और यूरोप रहा है, वहां मंदी है… पर अमेरिका, खाड़ी देश, अफ्रीका जैसे नए दरवाज़े भी खुल रहे हैं।”

उनकी उम्मीद कायम है – “अभी थोड़ी धुंध है, लेकिन रास्ता साफ़ होने ही वाला है।” Agra Shoe Association – सबको साथ लेकर चलने की मिसाल एक अच्छे उद्यमी के साथ-साथ, लवली साहब एक कुशल संगठक भी हैं। Agra Shoe Manufacturing Association के अध्यक्ष के रूप में वो मानते हैं कि, “जब तक मार्केट मजबूत नहीं होगा, फैक्ट्री नहीं बढ़ेगी।”

उनका विज़न है – “हर कारीगर, हर डिज़ाइनर, हर निर्माता एक परिवार की तरह जुड़े, तभी आगरा की असली ताक़त उभरेगी।” आगरा के कारीगर जिनकी उंगलियों में कला है। लवली सिंह आगरा के कारीगरों को इस उद्योग की आत्मा मानते हैं। “जैसे कोई शायर अल्फाज़ बुनता है, वैसे ही हमारे कारीगर हाथों से जूते गढ़ते हैं। जो गुणवत्ता आगरा के हाथ से बने जूतों में है, वो मशीन कभी नहीं दे सकती।”

युवाओं से सीधी बात – नौकरी नहीं, कारोबार की बात करो
आज की पीढ़ी को वे कहते हैं – “सरकारी नौकरी का सपना छोड़ो, क्योंकि वो सिर्फ 1.7% लोगों को मिलती है। बाकी के लिए व्यापार है, मेहनत है, रास्ता है। जूता उद्योग को वे सबसे कम निवेश में शुरू होने वाला सबसे स्थायी व्यवसाय मानते हैं। अगर कोई युवा सीरियस है, सीखना चाहता है, तो दरवाज़ा हमेशा खुला है। मैं उसकी हर मदद को तैयार हूँ।”

उपेन्द्र सिंह लवली – एक नाम, एक आंदोलन
वो सिर्फ एक कारोबारी नहीं, एक प्रेरणा हैं। उनकी यात्रा बताती है सपनों को पूरा करने के लिए पूंजी नहीं, बल्कि पसीना चाहिए और जब पसीना इरादे के साथ बहता है, तो रास्ता खुद बन जाता है।

अंत में… एक सलाम
Industrial Empire उन्हें सलाम करता है – क्योंकि उन्होंने न केवल जूते बनाए, बल्कि हज़ारों लोगों के पैरों को पहचान दी और आगरा को ग्लोबल फुटवियर मैप पर ला खड़ा किया। “600 रुपये की नौकरी से शुरू की थी, आज लाखों की मेहनत की मिसाल हैं वो। जो जूते बनाते-बनाते चल पड़े, वो अब हजारों को आगे बढ़ा रहे हैं।”

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