मौसम में बदलाव का असर अब खेती और खाद्य बाजार पर भी दिखाई देने की आशंका है। अल नीनो के कारण बारिश और तापमान का सामान्य चक्र प्रभावित होने से भारत में तिलहन, धान, दाल और गन्ने जैसी फसलों के उत्पादन को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। यदि घरेलू उत्पादन में कमी आती है, तो खाद्य पदार्थों की मांग पूरी करने के लिए भारत को आयात पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है। इससे खाद्य तेल, पशु आहार और कुछ अन्य कृषि उत्पादों की कीमतों पर दबाव बढ़ने की संभावना है।
तिलहन उत्पादन में गिरावट की आशंका
खरीफ सीजन में सोयाबीन और मूंगफली की पैदावार को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं। कुछ कृषि क्षेत्रों में सूखे और प्रतिकूल मौसम का असर फसलों पर पड़ने की आशंका है। इसके अलावा, आगामी सरसों की फसल का उत्पादन भी खाद्य तेल बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगा।
यदि घरेलू स्तर पर तिलहन की उपलब्धता घटती है, तो खाद्य तेल कंपनियों को विदेशों से अधिक खरीद करनी पड़ सकती है। इससे भारत के आयात बिल में बढ़ोतरी हो सकती है। उद्योग जगत भी कच्चे माल की उपलब्धता बनाए रखने के लिए आयात संबंधी नियमों में राहत की मांग कर रहा है।
पोल्ट्री कारोबार पर भी पड़ सकता है असर
पोल्ट्री उद्योग के लिए सोयाबीन मील और मक्का प्रमुख कच्चे माल हैं। इनकी कीमतें बढ़ने से मुर्गियों के आहार की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर अंडे और चिकन की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे दिव्य कुमार गुलाटी के अनुसार, उद्योग ने सरकार से 30 लाख टन सोयाबीन मील आयात करने की अनुमति मांगी है। उद्योग का तर्क है कि पर्याप्त कच्चा माल उपलब्ध नहीं होने पर उत्पादन लागत बढ़ सकती है। हालांकि, खाद्य पदार्थों की वास्तविक कीमतों पर असर घरेलू उत्पादन, आयात नीति और बाजार में मांग-आपूर्ति की स्थिति पर निर्भर करेगा।
भारत की खाद्य तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा
भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों के लिए काफी हद तक विदेशी बाजारों पर निर्भर है। पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सूरजमुखी तेल देश के प्रमुख आयातित खाद्य तेल हैं।
पाम ऑयल मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है, जबकि सोयाबीन तेल के प्रमुख स्रोत अर्जेंटीना और ब्राजील हैं। सूरजमुखी तेल की आपूर्ति में रूस और यूक्रेन जैसे देशों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने या आपूर्ति बाधित होने पर घरेलू बाजार भी प्रभावित हो सकता है।
क्या है अल नीनो और खेती से इसका संबंध?
अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक होने से जुड़ी जलवायु घटना है। यह वैश्विक मौसम प्रणालियों को प्रभावित कर सकती है और भारत में मानसून के व्यवहार पर भी असर डाल सकती है। हालांकि, हर अल नीनो के दौरान भारत में सूखा पड़ना या फसल उत्पादन घटना जरूरी नहीं है।
आने वाले समय में मानसून, मिट्टी में नमी, फसल की स्थिति और सरसों सहित रबी फसलों के उत्पादन पर नजर रहेगी। यदि प्रतिकूल मौसम के कारण पैदावार प्रभावित होती है, तो खाद्य तेल और पशु आहार के आयात की जरूरत बढ़ सकती है। इसका असर किसानों, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।