दिल्ली। अल्पना की दुनिया: जहां मधुबनी सिर्फ दीवारों पर नहीं, ज़िंदगी के कैनवास पर खिलती है। “मैं बिहार से बिलॉन्ग करती हूं… और आज दिल्ली में मधुबनी के रंगों से नारी शक्ति को आत्मनिर्भरता का नया अर्थ दे रही हूं” – अल्पना झा, संस्थापक – अपना कोना क्रिएटिव फाउंडेशन
बचपन की छुट्टियों से मधुबनी की उड़ान तक
अल्पना झा का बचपन बिहार के पारंपरिक परिवेश में बीता — जहां नानी, दादी, बुआ, चाची सब मधुबनी कला की जादूगर थीं। समर वेकेशन आते ही जब बाकी बच्चे घूमने निकलते, अल्पना रंगों और ब्रशों की दुनिया में उतर जातीं। 1996, जब वो 12वीं क्लास में थीं, उन्होंने अपना पहला एग्ज़िबिशन लगाया — और यहीं से एक सपना आकार लेने लगा।
दिल्ली में संघर्ष और नए सिरे से शुरुआत
बिहार से दिल्ली आकर खुद को जमाना आसान नहीं था। घर-परिवार, छोटे बच्चे और नए शहर की चुनौतियों के बीच, उन्होंने स्कूलों में बतौर आर्ट टीचर काम किया। लेकिन दिल तो बस रंगों में ही बसता था। “मन तो मेरा वहीं खींच रहा था… मधुबनी की ओर।” इस रुझान ने उन्हें प्रेरित किया कि घर से ही Alpana Creations की नींव रखी जाए।
‘अपना कोना’ – हर महिला का अपना कोना
धीरे-धीरे उन्होंने आसपास की महिलाओं को जोड़ना शुरू किया और बना दी एक स्वयंसेवी संस्था — ‘अपना कोना क्रिएटिव फाउंडेशन’। “हर महिला के जीवन में एक कोना होना चाहिए… जहां वो सिर्फ अपनी हो।” – अल्पना झा
यह सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि वो जगह है जहां विधवाएं, हाउसवाइफ्स और हुनरमंद महिलाएं आकर अपनी पहचान बनाती हैं। यहां ट्रेनिंग होती है, प्रोडक्ट बनते हैं और फिर बाजार भी दिलाया जाता है।
उमा नेगी की कहानी: दुःख से उम्मीद तक का सफर
“2020 में मेरे पति की अचानक मृत्यु हो गई… और तभी मुझे ‘अपना कोना’ का सहारा मिला” – उमा नेगी, प्रशिक्षिका, उत्तराखंड। चार बच्चों की मां, उमा आज संस्था में ट्रेनर हैं। वो कहती हैं, “मेहनत मेरी थी, लेकिन हौसला मैम का था। अगर हुनर है तो औरत भी कमा सकती है, खा सकती है और बच्चों को पढ़ा सकती है।”
मधुबनी अब सिर्फ फ्रेम में नहीं, हर फॉर्म में
Alpana Creations ने मधुबनी को एक नई पहचान दी है। अब यह कला दीवारों से निकलकर:
- जूट डायरी
- लैपटॉप बैग्स
- कैनवास टोट बैग्स
- स्टेशनरी
- ज्वेलरी
- गिफ्ट बॉक्सेस
- ड्रेस मटीरियल और साड़ियां
तक पहुंच चुकी है। हमने मधुबनी को इको-फ्रेंडली, फंक्शनल और यूथ-फ्रेंडली बनाया है।
दिवाली मेले से इंटरनेशनल ट्रेड फेयर तक का सफर
कभी 1000–3000 रुपए देकर मेले में स्टॉल लेना पड़ता था। आज NULM, MSME और PMEGP की योजनाओं के जरिए बिना खर्च के इंटरनेशनल ट्रेड फेयर में हिस्सा मिल रहा है। “अगर वक्त लगे तो लगे, लेकिन सही रास्ते पर चलो… सरकार की योजनाएं महिलाओं को बदल सकती हैं।”
एक सपना: हर महिला आत्मनिर्भर बने
अल्पना का लक्ष्य सिर्फ अपनी कंपनी चलाना नहीं बल्कि सैकड़ों महिलाओं को ट्रेनिंग देकर ‘आत्मनिर्भर भारत’ की जमीनी मिसाल बनाना है। अगर मैंने उस वक्त पीएमईजीपी से लोन न लिया होता तो शायद आज इतनी महिलाएं मेरे साथ खड़ी नहीं होतीं।
अल्पना की जुबानी, अल्फ़ाज़ जो प्रेरणा बन जाएं:
“हर महिला को एक ‘अपना कोना’ चाहिए… जहां वह खुद को फिर से खोज सके।”