Brahmi farming: छत्तीसगढ़ के किसान अब पारंपरिक धान खेती के साथ-साथ औषधीय फसलों की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। इसी बदलाव का सबसे सफल उदाहरण ब्राह्मी की खेती बनकर उभरा है। दिमागी स्वास्थ्य और स्मरण शक्ति बढ़ाने वाली औषधि के रूप में प्रसिद्ध ब्राह्मी की बाजार में लगातार मांग बनी रहती है, जिससे किसानों को स्थिर और भरोसेमंद आय मिल रही है। कम लागत, बार-बार कटाई और तय बाजार व्यवस्था ने इसे किसानों के लिए लाभकारी विकल्प बना दिया है।
क्यों बढ़ रही है ब्राह्मी की खेती की लोकप्रियता
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार ब्राह्मी एक बहुवर्षीय औषधीय फसल है, जो एक बार लगाने के बाद तीन से चार वर्षों तक उत्पादन देती है। इसकी खासियत यह है कि हर तीन महीने में इसकी कटाई की जा सकती है, यानी साल में चार बार आय का अवसर मिलता है। स्वास्थ्य और आयुर्वेदिक उत्पादों में उपयोग होने के कारण इसकी मांग सालभर बनी रहती है। यही वजह है कि किसान अब इसे पारंपरिक फसलों के साथ पूरक आय स्रोत के रूप में अपना रहे हैं।
कम लागत, ज्यादा मुनाफा
धान की खेती में जहां प्रति एकड़ लागत अधिक और लाभ सीमित रहता है, वहीं ब्राह्मी की खेती में लागत अपेक्षाकृत बहुत कम है। कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार एक एकड़ में ब्राह्मी की वार्षिक लागत लगभग 21 हजार रुपये तक आती है। वहीं उत्पादन करीब 30 क्विंटल तक हो सकता है, जिससे किसानों को लगभग 1.5 लाख रुपये तक की आय मिलती है। इस तरह शुद्ध लाभ करीब 1.20 लाख रुपये तक पहुंच जाता है। यही स्पष्ट आर्थिक लाभ किसानों को इस नई खेती मॉडल की ओर आकर्षित कर रहा है।
सरकार और बोर्ड से मिल रहा सहयोग
राज्य में औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएं चलाई जा रही हैं। किसानों को ब्राह्मी की रोपण सामग्री मुफ्त उपलब्ध कराई जा रही है, जिससे शुरुआती लागत और घट गई है। इसके साथ ही सबसे बड़ी चिंता—बाजार—को भी दूर किया गया है। किसानों की उपज के लिए पहले से खरीद अनुबंध की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है, जिससे उन्हें फसल बेचने की परेशानी नहीं होती। यह भरोसेमंद विपणन व्यवस्था किसानों को जोखिम से बचाती है और खेती को स्थायी आय मॉडल बनाती है।
छत्तीसगढ़ की जलवायु बनी वरदान
ब्राह्मी की खेती के लिए नमी और हल्के जलभराव वाली भूमि उपयुक्त मानी जाती है। छत्तीसगढ़ के कई क्षेत्रों में ऐसी परिस्थितियां प्राकृतिक रूप से उपलब्ध हैं, जहां पारंपरिक फसलों में नुकसान की आशंका रहती है। ऐसे इलाकों में ब्राह्मी आसानी से उग जाती है और अच्छी पैदावार देती है। यही कारण है कि किसान अब अनुपयोगी या कम उत्पादक जमीन पर भी इस फसल को अपनाने लगे हैं।
किसानों के लिए प्रेरणा बन रहे सफल उदाहरण
रायपुर और धमतरी जिलों में लगभग 36 किसान करीब 15 एकड़ क्षेत्र में ब्राह्मी की सफल खेती कर रहे हैं। इन किसानों ने कम लागत में अधिक आय का मॉडल प्रस्तुत किया है, जिससे आसपास के किसान भी प्रेरित हो रहे हैं। धीरे-धीरे यह खेती क्षेत्र में एक सामूहिक बदलाव का रूप ले रही है, जहां किसान पारंपरिक खेती पर निर्भरता कम कर वैकल्पिक आय स्रोत बना रहे हैं।
औषधीय खेती में उभरता अग्रणी राज्य
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में छत्तीसगढ़ औषधीय पौधों की खेती में अग्रणी राज्यों में शामिल हो सकता है। ब्राह्मी सहित कई औषधीय पौधों की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बढ़ रही है। अगर उत्पादन संगठित रूप से बढ़ता है, तो यह राज्य के किसानों के लिए बड़े निर्यात अवसर भी खोल सकता है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल सकती है।
आत्मनिर्भर किसान की ओर बढ़ता कदम
वन विभाग और औषधीय पौध बोर्ड के संयुक्त प्रयासों से किसान अब खेती को केवल परंपरा नहीं, बल्कि व्यवसाय के रूप में देखने लगे हैं। ब्राह्मी की खेती उन्हें नियमित आय, कम जोखिम और सुनिश्चित बाजार प्रदान कर रही है। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है और वे आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ब्राह्मी की खेती केवल एक फसल नहीं बल्कि ग्रामीण आय बढ़ाने का प्रभावी मॉडल बनकर सामने आई है। कम लागत, स्थिर मांग और सरकारी सहयोग के कारण यह खेती भविष्य में किसानों के लिए नई आर्थिक क्रांति साबित हो सकती है।