नई दिल्ली: आज भारतीय उद्योग जगत के कई बड़े कारोबारी दुनियाभर में अपनी पहचान बना चुके हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब भारतीय कंपनियों के लिए विदेशों में कारोबार करना बेहद मुश्किल था। विदेशी मुद्रा संबंधी नियम, पूंजी की कमी और सरकारी पाबंदियों के बीच उद्योगपति आदित्य विक्रम बिड़ला ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कदम रखा। अपनी कारोबारी दूरदृष्टि और रणनीति के दम पर उन्होंने ऐसा वैश्विक कारोबार खड़ा किया कि कई देशों की सरकारें उन्हें निवेश के लिए आमंत्रित करने लगीं।
थाईलैंड से हुई विदेशी कारोबार की शुरुआत
आदित्य बिड़ला ने 1960 के दशक के आखिर में थाईलैंड में अपने अंतरराष्ट्रीय कारोबार की नींव रखी। उस समय वहां विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया जा रहा था। उन्होंने इस अवसर का लाभ उठाते हुए करीब एक करोड़ रुपये की लागत से टेक्सटाइल मिल स्थापित की।
शुरुआती दौर में थाई एयरवेज से मिला बड़ा ऑर्डर उनके कारोबार के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ। एयरलाइन ने अपनी एयर होस्टेस की यूनिफॉर्म के लिए उनकी कंपनी से कपड़ा खरीदा। इसके बाद उन्होंने थाईलैंड के साथ इंडोनेशिया और फिलीपींस में भी कारोबार का विस्तार किया।
10 साल में खड़ी कीं 10 कंपनियां
1970 से 1980 के बीच आदित्य बिड़ला ने दक्षिण-पूर्व एशिया में 10 कंपनियां स्थापित कीं। इन कंपनियों की कुल बिक्री लगभग 10 करोड़ डॉलर तक पहुंच गई। आगे चलकर मलेशिया, थाईलैंड और दूसरे एशियाई बाजारों में उनका निवेश बढ़ता गया।
उनकी रणनीति थी कि जिन उद्योगों की समझ और अनुभव भारत में विकसित हुआ है, उन्हीं क्षेत्रों में विदेशी बाजारों के अवसर तलाशे जाएं। टेक्सटाइल, रेयॉन, पाम ऑयल और कार्बन ब्लैक जैसे उद्योग इसी रणनीति का हिस्सा बने।
फिलीपींस में झटका, फिर की वापसी
1986 में फिलीपींस में राजनीतिक बदलाव के बाद आदित्य बिड़ला के कारोबार को बड़ा नुकसान हुआ। फर्डिनेंड मार्कोस की सत्ता समाप्त होने के बाद उनकी एक नारियल तेल रिफाइनरी का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। इसके बावजूद उन्होंने वहां से पूरी तरह पीछे हटने के बजाय दोबारा निवेश का रास्ता चुना।
1987 में उन्होंने 5.5 करोड़ डॉलर की परियोजना की घोषणा की, जिसके तहत रेयॉन फाइबर का उत्पादन किया जाना था। बाद में उन्होंने फिलीपींस में अपनी कारोबारी मौजूदगी और मजबूत की।
1995 तक 14 देशों में पहुंचा कारोबार
1990 में आदित्य बिड़ला के पास थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस में 12 कंपनियां थीं, जिनका कुल कारोबार करीब 1,200 करोड़ रुपये बताया गया। 1995 तक उनका विस्तार 14 देशों में 17 कंपनियों तक हो गया और बिक्री लगभग 5,200 करोड़ रुपये पहुंच गई।
उनकी सफलता का एक अहम पहलू यह था कि उन्होंने बदलते बाजारों के अनुसार अपने निवेश का विस्तार किया। 1988 में कार्बन ब्लैक कारोबार में प्रवेश के बाद भारत के अलावा थाईलैंड और मिस्र में भी संयंत्र स्थापित किए गए। इससे समूह की अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक पहचान मजबूत हुई।
सरकारें भी निवेश के लिए देने लगीं न्योता
विदेशों में कारोबार बढ़ने के साथ आदित्य बिड़ला की पहचान एक वैश्विक निवेशक के रूप में बनने लगी। थाईलैंड में समूह की लंबे समय से मौजूदगी और नए निवेश की योजनाओं ने उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत पहचान दिलाई। रूस में भी समूह ने 1994 में विस्तार की घोषणा की।
आज आदित्य बिड़ला समूह का कारोबार 40 से अधिक देशों में फैला है। सीमेंट, धातु, टेक्सटाइल, कार्बन ब्लैक और वित्तीय सेवाओं समेत कई क्षेत्रों में इसकी मौजूदगी है। एक करोड़ रुपये के शुरुआती विदेशी निवेश से वैश्विक कारोबारी पहचान तक का यह सफर भारतीय उद्योग जगत में अंतरराष्ट्रीय विस्तार की महत्वपूर्ण मिसाल माना जाता है।